सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) किसी देश की आर्थिक गतिविधियों का सबसे महत्वपूर्ण संकेतक होता है। यह एक निश्चित समयावधि (जैसे कि एक वर्ष) में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के कुल बाजार मूल्य को मापता है।

गणना के लिए जिस वर्ष को संदर्भ बिंदु बनाया जाता है, उसे “आधार वर्ष” कहा जाता है। भारत में वर्तमान आधार वर्ष 2011-12 है। इसका अर्थ है कि उस वर्ष की कीमतों और संरचना के अनुसार आने वाले वर्षों की जीडीपी की तुलना और गणना की जाती है।

हाल ही में, भारत सरकार ने घोषणा की है कि 2022-23 को सकल घरेलू उत्पाद का नया आधार वर्ष बनाया जाएगा और नई जीडीपी श्रृंखला 27 फरवरी, 2026 को जारी की जाएगी।

सिर्फ जीडीपी ही नहीं, कई अन्य सूचकांक भी बदले जाएंगे, वित्त मंत्रालय ने पुष्टि की है कि अन्य प्रमुख आँकड़े भी अद्यतन किए जाएंगे:
औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) का आधार वर्ष भी 2022-23 किया जाएगा।
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) का आधार वर्ष 2023-24 कर दिया जाएगा, जो मुद्रास्फीति का अनुमान लगाने में उपयोग होता है।

भारत के लिए राष्ट्रीय आय (जीडीपी) के अनुमानों का पहला सेट 1949 में पीसी महालनोबिस की अध्यक्षता में “राष्ट्रीय आय समिति” द्वारा संकलित किया गया था। इस समिति द्वारा राष्ट्रीय आय की पहली और अंतिम रिपोर्ट क्रमशः 1951 और 1954 में लाई गईं।

यह आठवां अवसर होगा जब भारत में जीडीपी का आधार वर्ष बदला जाएगा। अब तक हुए प्रमुख संशोधन इस प्रकार हैं:

  • 1948-49 से 1960-61 (1967 में)
  • 1960-61 से 1970-71 (1978 में)
  • 1970-71 से 1980-81 (1988 में)
  • 1980-81 से 1993-94 (1999 में)
  • 1993-94 से 1999-2000 (2006 में)
  • 1999-2000 से 2004-05 (2010 में)
  • 2004-05 से 2011-12 (2015 में)

हर संशोधन में न केवल आधार वर्ष बदला गया, बल्कि डेटा स्रोतों और गणना पद्धतियों को भी अद्यतन किया गया।

जीडीपी के आधार वर्ष में संशोधन का मुख्य उद्देश्य देश की वास्तविक आर्थिक स्थिति को अधिक सटीक ढंग से मापना और प्रस्तुत करना है। यह न केवल नीति निर्माताओं, बल्कि कारोबारी संस्थाओं, निवेशकों और उद्यमियों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण होता है, ताकि वे सटीक आर्थिक आँकड़ों के आधार पर निर्णय ले सकें।

भारत जैसे विविध और विशाल देश में जीडीपी की गणना कोई आसान कार्य नहीं है। जीडीपी एक ऐसी संख्या है जो पूरे देश की आर्थिक गतिविधियों को समाहित करती है। इसकी गणना अलग-अलग दृष्टिकोणों से की जा सकती है—जैसे उपभोक्ता कितना खर्च कर रहा है या देश में कितना उत्पादन और आमदनी हो रही है।

यहाँ “अंतिम वस्तुएँ” शब्द पर ध्यान देना आवश्यक है। जीडीपी में केवल उन्हीं वस्तुओं और सेवाओं को शामिल किया जाता है जो अंतिम उपभोक्ता द्वारा प्रयोग की जाती हैं।

क्रिकेट बैट एक अंतिम उत्पाद है, पर इसमें कई मध्यवर्ती वस्तुएँ लगी होती हैं—जैसे लकड़ी, रबर ग्रिप, चिपकाने वाला पदार्थ आदि। इन सभी को बनाते समय भी कई चरणों से गुज़रना पड़ता है। लेकिन जीडीपी में केवल क्रिकेट बैट की अंतिम कीमत जोड़ी जाएगी—ना कि उसमें प्रयुक्त सभी सामग्रियों की अलग-अलग लागत।

इसलिए, मध्यवर्ती वस्तुओं की कीमतें हटा दी जाती हैं, ताकि दोहरी गणना न हो। यही प्रक्रिया जीडीपी की गणना को जटिल बना देती है।

भारत की अर्थव्यवस्था समय के साथ कई बुनियादी बदलावों से गुज़री है। स्वतंत्रता के बाद यह मुख्य रूप से कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था थी। आज, भारत की जीडीपी में सेवा क्षेत्र का योगदान 55% से अधिक हो गया है, जबकि कृषि का हिस्सा घटकर 20% से भी कम रह गया है।

हालांकि, खेती में लगे लोगों की संख्या में उस अनुपात में गिरावट नहीं आई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि अब जीडीपी के अलग-अलग क्षेत्रों की गणना के लिए अलग पद्धतियों और स्रोतों की आवश्यकता है।

जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था में परिवर्तन होते हैं, वैसे-वैसे जीडीपी की गणना में प्रयुक्त आंकड़ों और पद्धतियों को अद्यतन करना ज़रूरी हो जाता है।

पहले, भारत में हर दशक में एक बार जीडीपी का आधार वर्ष बदला जाता था और यह वर्ष अक्सर 1 पर समाप्त होता था (जैसे 1980-81 या 1990-91)। ऐसा इसलिए था क्योंकि जनगणना उन्हीं वर्षों में होती थी, जिससे अनौपचारिक क्षेत्र के आँकड़े प्राप्त किए जाते थे।

लेकिन 1993-94 के बाद से राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (NSSO) द्वारा किए गए रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण के आंकड़े हर पाँच साल में एक बार नियमित रूप से उपलब्ध होने लगे। फलतः जीडीपी का आधार वर्ष अब हर 5 वर्षों में संशोधित किया जाने लगा (1999, 2006, 2010, 2015…)।

यह प्रक्रिया राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग की उस सिफारिश के अनुरूप है जिसमें कहा गया था कि सभी प्रमुख आर्थिक संकेतकों को कम से कम हर पाँच वर्षों में पुनः अद्यतन किया जाना चाहिए।

आधार वर्ष और जीडीपी गणना की कार्यप्रणाली में समय-समय पर किए जाने वाले संशोधन से दो मुख्य तरीकों से लाभ होता है:

1. अर्थव्यवस्था की संरचना में आए बदलावों को प्रतिबिंबित करना

समय के साथ भारत की अर्थव्यवस्था में नई गतिविधियाँ और उद्योग जुड़े हैं, जबकि कुछ पुराने उद्योग अप्रासंगिक हो गए हैं।

जब आधार वर्ष को अद्यतन किया जाता है, तो उसमें नई आर्थिक गतिविधियों को शामिल किया जा सकता है—जैसे डिजिटल सेवाएँ, ई-कॉमर्स, स्टार्टअप आधारित सेवाएँ आदि—जो पहले की श्रृंखला में सम्मिलित नहीं थीं। इससे जीडीपी वास्तविक अर्थव्यवस्था का अधिक सटीक प्रतिबिंब बन जाती है।

2. “वास्तविक” आर्थिक वृद्धि को सटीक रूप से मापना

जब हम किसी वर्ष की आर्थिक वृद्धि को आंकते हैं, तो यह ज़रूरी होता है कि हम केवल कीमतों में वृद्धि को नहीं, बल्कि वास्तविक उत्पादन में हुई वृद्धि को मापें।

उदाहरण के लिए, मान लीजिए एक साल में देश में जितनी कारें बनीं, उतनी ही अगली साल में भी बनीं, लेकिन कीमतें दोगुनी हो गईं। ऐसी स्थिति में वास्तविक उत्पादन नहीं बढ़ा, लेकिन नॉमिनल जीडीपी दोगुनी हो गई।

अगर उत्पादन वास्तव में दोगुना हुआ लेकिन कीमतें स्थिर रहीं, तब भी जीडीपी दोगुनी होगी। इसलिए, यह जरूरी है कि जीडीपी से मुद्रास्फीति के प्रभाव को हटाकर “वास्तविक वृद्धि” को मापा जाए। नई आधार वर्ष श्रृंखला हमें इसी “वास्तविक” वृद्धि को बेहतर तरीके से समझने और दर्शाने में मदद करती है।

आमतौर पर, जीडीपी का आधार वर्ष हर पाँच साल में बदला जाता है। इसलिए, यह अपेक्षित था कि 2016-17 या 2017-18 में नया आधार वर्ष निर्धारित किया जाएगा। दरअसल, 2017 में सरकार ने घोषणा की थी कि 2017-18 को नया आधार वर्ष बनाया जाएगा और जीडीपी की नई श्रृंखला तैयार की जाएगी।

इसके लिए सरकार दो महत्वपूर्ण आँकड़ों पर निर्भर थी:

उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण (CES) – यह उपभोक्ताओं के खर्च के स्तर और पैटर्न को दर्शाता है।

आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) – यह रोजगार और बेरोजगारी से जुड़े आँकड़े देता है और पुराने पंचवर्षीय सर्वेक्षणों की जगह ले चुका है।

इन दोनों सर्वेक्षणों के परिणाम 2017-18 में एकत्र किए गए, लेकिन दोनों को लेकर डेटा की गुणवत्ता पर सवाल उठे।

PLFS ने दिखाया कि बेरोजगारी दर 45 वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुँच गई थी।

CES ने संकेत दिया कि 2011-12 के बाद से गरीबी बढ़ी है, क्योंकि औसत खर्च में गिरावट देखी गई – यह एक ऐतिहासिक उलटफेर था।

इन निष्कर्षों ने सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा की। 2019 के चुनावों के बाद, सरकार ने PLFS को तो स्वीकार कर लिया, लेकिन CES के आँकड़ों को खारिज कर दिया। इसके कारण, 2017-18 को आधार वर्ष बनाने की प्रक्रिया स्थगित कर दी गई।

इस वर्ष भारत ने दो बड़े नीतिगत झटकों का अनुभव किया:

नोटबंदी (नवंबर 2016): भारत की 86% नकदी चलन से बाहर कर दी गई।

जीएसटी (जुलाई 2017): एक नई कर प्रणाली लागू की गई जिससे व्यापार और उत्पादन तंत्र में अस्थायी अव्यवस्था आई।

इन परिवर्तनों का असर 2017-18 की अर्थव्यवस्था पर स्पष्ट रूप से पड़ा। परिणामस्वरूप, जीडीपी वृद्धि दर 2016-17 में 8% से गिरकर 2019-20 में 4% से भी नीचे चली गई।

कोविड महामारी और अन्य व्यवधान

जब 2020 में कोविड-19 महामारी फैली, तो देशभर में व्यापक आर्थिक ठहराव आया। इसके बाद के वर्षों को भी “सामान्य” आर्थिक वर्ष नहीं माना जा सकता, क्योंकि अर्थव्यवस्था अभी भी संकट और अनिश्चितता से जूझ रही थी।

भारत 2017-18 में एक संशोधन चक्र से चूक चुका है, जिसका मतलब है कि मौजूदा जीडीपी आंकड़ों में संभावित त्रुटियाँ या अप्रासंगिकताएँ हो सकती हैं।

हाल के वर्षों में, PLFS और CES जैसे प्रमुख सर्वेक्षणों के आंकड़ों को लेकर विवाद हुए हैं।

जनगणना 2021 अब तक नहीं हुई है, जिससे कई महत्वपूर्ण आँकड़ों में रिक्तियाँ और संदेह बने हुए हैं।

इस सबके बीच, भारत अब अमेरिका और चीन के बाद तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहा है (नॉमिनल जीडीपी के संदर्भ में)। इसका अर्थ है कि दुनियाभर के निवेशक, एजेंसियाँ और विश्लेषक भारत के आंकड़ों की बारीकी से जांच करेंगे।

यह नया संशोधन सिर्फ एक तकनीकी अपडेट नहीं है—यह भारत की अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रतिष्ठा, निवेश योग्य वातावरण, और नीति-निर्माण की विश्वसनीयता को सीधे प्रभावित करेगा।

अरबों डॉलर के वैश्विक निवेश का प्रवाह इस बात पर निर्भर करेगा कि आंकड़े कितने पारदर्शी और भरोसेमंद हैं।

साथ ही, भारत के घरेलू नीति-निर्माण में भी यह सुनिश्चित करना आवश्यक होगा कि निर्णय वास्तविक और अद्यतन आर्थिक स्थिति पर आधारित हों।

आधार वर्ष का संशोधन कोई तकनीकी औपचारिकता नहीं है। यह भारत जैसे विशाल और जटिल देश की आर्थिक स्थिति को सटीकता से समझने का जरिया है। यह बदलाव न केवल नीतियों को दिशा देगा, बल्कि भारत को एक भरोसेमंद आर्थिक ताकत के रूप में प्रस्तुत करने में भी मदद करेगा।

By QuizHat

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