भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) का पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV) लंबे समय से भारत का सबसे भरोसेमंद प्रक्षेपण यान माना जाता रहा है। इसे “वर्कहॉर्स ऑफ ISRO” कहा जाता है क्योंकि इसने सैकड़ों भारतीय और विदेशी उपग्रहों को सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित किया है। इसी पृष्ठभूमि में PSLV-C62 मिशन की असफलता न केवल तकनीकी दृष्टि से, बल्कि संस्थागत पारदर्शिता, गुणवत्ता नियंत्रण और अंतरराष्ट्रीय विश्वास के लिहाज़ से भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

12 जनवरी 2026 को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से PSLV-C62 का प्रक्षेपण किया गया। इस मिशन का प्राथमिक पेलोड था EOS-N1, जो कि रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) का एक निगरानी उपग्रह था। इसके अतिरिक्त, इस मिशन में 15 सह-यात्री (co-passenger) उपग्रह भी शामिल थे, जिनमें थाईलैंड, यूनाइटेड किंगडम, नेपाल, फ्रांस, स्पेन और ब्राज़ील के उपग्रहों के साथ-साथ भारत की निजी कंपनियों के सात उपग्रह थे। यह मिशन ISRO की वाणिज्यिक इकाई NewSpace India Limited (NSIL) के माध्यम से संचालित किया गया था, जिससे इसकी व्यावसायिक अहमियत और बढ़ जाती है।

प्रक्षेपण के शुरुआती चरण पूरी तरह सामान्य रहे। रॉकेट ने पहले और दूसरे चरण (PS1 और PS2) को सफलतापूर्वक पूरा किया। समस्या तीसरे चरण (PS3) के अंतिम हिस्से में उत्पन्न हुई। इसरो अध्यक्ष वी. नारायणन ने टीवी पर दिए गए बयान में बताया कि PS3 के अंत के पास रॉकेट के रोल रेट में असामान्य वृद्धि देखी गई। इसका अर्थ यह है कि रॉकेट अपनी धुरी पर अनियंत्रित रूप से घूमने लगा, जिससे उसका संतुलन बिगड़ गया और वह निर्धारित उड़ान पथ से भटक गया। इस स्थिति में उपग्रहों को सुरक्षित और सटीक कक्षा में स्थापित करना संभव नहीं रह गया।

थाईलैंड की अंतरिक्ष एजेंसी GISTDA की प्रतिक्रिया

PSLV-C62 पर थाईलैंड का THEOS-2A उपग्रह भी सवार था। घटना के बाद थाईलैंड की अंतरिक्ष एजेंसी GISTDA ने एक आधिकारिक बयान जारी किया। इसमें कहा गया कि तीसरे चरण के अंतिम हिस्से में खराबी उत्पन्न हुई और रॉकेट अपने निर्धारित मार्ग से हट गया। GISTDA ने यह भी कहा कि रॉकेट और उसके साथ मौजूद उपग्रहों के दक्षिणी हिंद महासागर में गिरकर जलने की संभावना है।

PSLV-C61 से समानताएँ: एक चिंताजनक पैटर्न

PSLV-C62 की विफलता को समझने के लिए PSLV-C61 मिशन (मई 2025) को देखना आवश्यक है। PSLV-C61 में भी शुरुआती चरण सामान्य थे, लेकिन PS3 के दौरान चैम्बर प्रेशर में गिरावट देखी गई, जिसके कारण तीसरा चरण अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सका और मिशन विफल हो गया। इस तरह, दोनों मिशनों में एक समान बात यह रही कि निर्णायक गड़बड़ी तीसरे चरण (PS3) में हुई। लगातार दो PSLV मिशनों में PS3 से जुड़ी समस्याएँ सामने आना ISRO के लिए गंभीर तकनीकी और प्रबंधकीय प्रश्न खड़े करता है।

किसी बड़े अंतरिक्ष मिशन की विफलता के बाद ISRO द्वारा Failure Analysis Committee (FAC) का गठन किया जाता है। यह कोई स्थायी संस्था नहीं होती, बल्कि ISRO अध्यक्ष द्वारा घटना-विशेष के लिए गठित की जाती है। FAC का मुख्य कार्य होता है-

  • टेलीमेट्री और उपप्रणाली (sub-system) डेटा का विश्लेषण
  • मिशन से जुड़े वैज्ञानिकों और इंजीनियरों से संवाद
  • विफलता की घटनाक्रम श्रृंखला (chain of events) का पुनर्निर्माण
  • मूल कारणों की पहचान और सुधारात्मक उपायों की सिफारिश

FAC में ISRO के वरिष्ठ वैज्ञानिकों के साथ-साथ शिक्षाविदों और कभी-कभी पूर्व ISRO अध्यक्षों को भी शामिल किया जाता है। समिति अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को सौंपती है।

PSLV-C61 मिशन के बाद गठित FAC ने अपनी रिपोर्ट 2025 के मध्य में PMO को सौंप दी थी, लेकिन इसे अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया है। यह स्थिति असामान्य है, क्योंकि अतीत में, जैसे GSLV-F10 (2021) और GSLV-F02 (2006) FAC रिपोर्ट का कम से कम सार ISRO द्वारा सार्वजनिक किया गया था। PSLV-C61 के मामले में न तो पूरी रिपोर्ट जारी हुई और न ही विस्तृत आधिकारिक सार। PSLV-C62 में भी PS3 से जुड़ी समस्या सामने आने के बाद, विशेषज्ञों ने इस गोपनीयता की आलोचना की है और पारदर्शिता की माँग की है।

ISRO की ओर से अब तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि PSLV-C62 के लिए FAC का गठन किया गया है या नहीं। ISRO की वेबसाइट पर केवल इतना कहा गया है कि “एक विस्तृत विश्लेषण शुरू किया गया है।” यह अस्पष्टता भी आलोचना का विषय बनी हुई है, क्योंकि लगातार दूसरी विफलता के बाद संस्थागत जवाबदेही और संचार की अपेक्षा और बढ़ जाती है।

PSLV-C62 का प्राथमिक पेलोड EOS-N1 भारत का था, इसलिए इसकी क्षति का आर्थिक भार भारत सरकार को उठाना होगा। थाईलैंड का THEOS-2A उपग्रह बीमित था, जिससे उस देश को वित्तीय सुरक्षा मिली। इसके विपरीत, भारत की निजी कंपनियों के कई उपग्रह बीमित नहीं थे, इसलिए उनका नुकसान सीधे-सीधे संबंधित कंपनियों को सहना पड़ेगा। यह घटना भारतीय निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए भी एक महत्वपूर्ण सबक है।

PSLV-C62 और उससे पहले PSLV-C61 की विफलताएँ ISRO के लिए चेतावनी हैं कि अत्यधिक विश्वसनीय माने जाने वाले प्रणालियों में भी गुणवत्ता नियंत्रण, निर्माण प्रक्रियाओं और परीक्षण तंत्र की पुनर्समीक्षा आवश्यक है। साथ ही, FAC रिपोर्टों को लेकर पारदर्शिता बनाए रखना ISRO की वैश्विक साख और साझेदारों के विश्वास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि ISRO इन घटनाओं से सीख लेकर सुधारात्मक कदम उठाता है, तो ये विफलताएँ भविष्य में भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम को और अधिक सुदृढ़ बनाने का आधार बन सकती हैं।

विगत वर्ष का प्रश्न 

प्रश्न: भारत के उपग्रह प्रमोचित करने वाले वाहनों के सन्दर्भमें, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए : UPSC 2018

  1. PSLV से वे उपग्रह प्रमोचित किए जाते हैं जो पृथ्वी के संसाधनों के मानीटरन में उपयोगी हैं,जबकि GSLV को मुख्यतः संचार उपग्रहों को प्रमोचित करने के लिए अभिकल्पित किया गया है।
  2. PSLV द्वारा प्रमोचित उपग्रह आकाश में एक ही स्थिति में स्थायी रूप में स्थिर रहते प्रतीत होते हैं जैसा कि पृथ्वी के एक विशिष्ट स्थान से देखा जाता है।
  3. GSLV Mk III, एक चार-स्टेज वाला प्रमोचनवाहन है, जिसमें प्रथम और तृतीय चरणों में ठोस रॉकेट मोटरों का तथा द्वितीय और चतुर्थ चरणों में द्रव रॉकेट इंजनों का प्रयोग होता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं ?

(a) केवल 1

(b) 2 और 3

(c) 1 और 2

(d) केवल 3 

By QuizHat

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