कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आज हमारे जीवन के हर पहलू में तेजी से प्रवेश कर रही है, चैटबॉट्स से लेकर मौसम पूर्वानुमान और जलवायु मॉडलिंग तक। तकनीक की यह क्रांति जहाँ दक्षता, उत्पादकता और नवाचार के नए द्वार खोल रही है, वहीं इसके पीछे एक ऐसी पर्यावरणीय लागत छिपी है, जिस पर अब तक अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया है-जल की बढ़ती खपत।

अब तक AI से जुड़ी बहस मुख्यतः उसकी भारी ऊर्जा मांग और कार्बन फुटप्रिंट पर केंद्रित रही है। किंतु हालिया शोध यह संकेत देते हैं कि AI को संचालित करने वाले डेटा सेंटर तेजी से मीठे जल के बड़े उपभोक्ता बनते जा रहे हैं। यह स्थिति ऐसे समय में उभर रही है जब विश्व का एक बड़ा हिस्सा पहले से ही जल संकट, सूखे और भूजल ह्रास का सामना कर रहा है।

AI आधारित प्रणालियाँ विशाल डेटा सेंटरों पर निर्भर होती हैं, जहाँ हजारों सर्वर चौबीसों घंटे संचालित रहते हैं। इन सर्वरों से उत्पन्न अत्यधिक ऊष्मा को नियंत्रित करने के लिए प्रायः फ्रेशवॉटर आधारित कूलिंग सिस्टम का उपयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया में बड़ी मात्रा में जल या तो वाष्पीकरण के माध्यम से नष्ट हो जाता है, या ऐसा अपशिष्ट जल बन जाता है जिसे पुनः उपयोग में लाना कठिन होता है।

यह तथ्य अक्सर तकनीकी विमर्श से बाहर रह जाता है कि डिजिटल सेवाओं की ‘अदृश्य’ प्रकृति वास्तव में भौतिक संसाधनों पर अत्यधिक निर्भर है।

चिंता की बात यह है कि वैश्विक स्तर पर लगभग 45 प्रतिशत डेटा सेंटर ऐसे नदी घाटियों में स्थित हैं, जहाँ पहले से ही जल तनाव अधिक है। अमेरिका में अकेले वर्ष 2023 में डेटा सेंटरों द्वारा लगभग 66 अरब लीटर जल की खपत की गई। इसके अतिरिक्त, किसी डेटा सेंटर के कुल जल पदचिह्न का लगभग 75 प्रतिशत अप्रत्यक्ष रूप से बिजली उत्पादन के माध्यम से होता है, क्योंकि ताप विद्युत संयंत्र भी भारी मात्रा में जल का उपयोग करते हैं।

इस प्रकार AI अवसंरचना का प्रभाव केवल प्रत्यक्ष जल उपयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ऊर्जा–जल–पर्यावरण के जटिल अंतर्संबंधों को भी उजागर करता है।

अध्ययन में भारत, चीन, स्पेन और जर्मनी जैसे देशों को विशेष रूप से चिह्नित किया गया है, जहाँ AI आधारित डेटा सेंटरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जबकि जल उपलब्धता सीमित होती जा रही है। भारत में पहले से मौजूद सूखा, भूजल का अत्यधिक दोहन और वर्षा की असमानता के बीच AI की बढ़ती मांग कृषि, आजीविका और पारिस्थितिकी तंत्र पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, मात्र 100 शब्दों का एक AI प्रॉम्प्ट लगभग एक बोतल जल की खपत करता है। यह आंकड़ा डिजिटल सेवाओं की उस ‘अदृश्य पर्यावरणीय लागत’ को रेखांकित करता है, जिसे आम उपभोक्ता प्रायः महसूस नहीं कर पाता।

जल केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का भी प्रश्न है। जब जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में डेटा सेंटर स्थापित होते हैं, तो स्थानीय समुदायों, किसानों और पारिस्थितिकी तंत्र के साथ संसाधनों की प्रतिस्पर्धा उत्पन्न होती है। यह प्रश्न उठता है कि क्या उच्च-तकनीकी सुविधाओं की जल आवश्यकताएँ स्थानीय आबादी की बुनियादी जरूरतों से ऊपर रखी जानी चाहिए।

रिपोर्ट की सबसे तीखी आलोचना डेटा सेंटर उद्योग में पारदर्शिता की कमी को लेकर है। वर्तमान में AI या डेटा सेंटर कंपनियों के लिए जल उपयोग, जल जोखिम या स्थानीय पर्यावरणीय प्रभावों के खुलासे से जुड़े कोई अनिवार्य वैश्विक नियम नहीं हैं। इससे सरकारों, निवेशकों और नागरिक समाज के लिए दीर्घकालिक जोखिमों का आकलन करना कठिन हो जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अब केवल ऊर्जा दक्षता पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। आवश्यकता है कि—

  • डेटा सेंटरों की स्थापना से पहले स्थानीय जल उपलब्धता और पारिस्थितिक संवेदनशीलता का आकलन हो,
  • जल-कुशल एवं वैकल्पिक कूलिंग तकनीकों को प्रोत्साहन मिले,
  • जल उपयोग से संबंधित अनिवार्य रिपोर्टिंग और पारदर्शी मानक विकसित किए जाएँ,
  • और तकनीकी विकास को सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) से जोड़ा जाए।

AI भविष्य की अर्थव्यवस्था, शासन और जलवायु समाधान में अहम भूमिका निभा सकता है। किंतु यह तभी संभव है जब उसकी भौतिक अवसंरचना को प्रकृति-संवेदनशील, सामाजिक रूप से न्यायसंगत और संसाधन-संतुलित दृष्टिकोण के साथ विकसित किया जाए।आज प्रश्न केवल यह नहीं है कि AI कितना बुद्धिमान है, बल्कि यह भी है कि उसके पीछे खड़ी अवसंरचना कितनी टिकाऊ, उत्तरदायी और मानव–प्रकृति संतुलन के प्रति सजग है।

By QuizHat

हिंदी माध्यम के लिए समर्पित

Leave a Reply

Discover more from FOR UPSC & STATE PSC...

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading