संदर्भ
हाल ही में रूस द्वारा यूक्रेन पर सैन्य कार्यवाही के बाद अंतर्राष्ट्रीय पटल पर तेजी से बदलाव हुए हैं। रूस के आक्रामक रवैये के कारण शुरू हुआ यह संघर्ष भारत को सीधे रूप से प्रभावित करेगा।
रूस का नाटो देशों पर आरोप है कि वे यूक्रेन को हथियारों की आपूर्ति कर रहे हैं और दोनों देशों के बीच के तनाव को भड़का रहें है। जबकि रूस चाहता है कि नाटो की सेनाएं 1997 के पहले की स्थिति में लौट जाए। उसकी मांग है कि नाटो गठबंधन पूर्व में अब अपनी सेना का और विस्तार न करें तथा पूर्वी यूरोप में अपनी सैन्य गतिविधियां बंद कर दे।
वहीं अगर इस समस्त घटनाक्रम में भारत की बात करें तो तात्कालिक प्रभाव युद्धरत क्षेत्र में फंसे हजारों भारतीय छात्रों की सुरक्षा है, वहीं दूसरी ओर इसका भारत पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ना भी स्वाभाविक है।
रूस पर लगाए जाने वाले आर्थिक प्रतिबंधों के कारण भारत के रक्षा आपूर्ति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। विदित है कि भारत अपनी रक्षा आवश्यकताओं के 50% से अधिक की पूर्ति हेतु रूस पर निर्भर है।
भारत के रक्षा क्षेत्र में रूस
स्वतंत्रता के बाद शुरूआती दौर में भारत अपने हथियारों के लिये पश्चिमी देशों पर निर्भर था। लेकिन यह निर्भरता 1970 के दशक से उस समय से कम होनी शुरू हुई जब भारत ने कई हथियार प्रणालियों के लिये सोवियत संघ से समझौता किया।
वर्तमान में भारतीय सशस्त्र बलों में रूसी मूल की रक्षा सामग्रियों की हिस्सेदारी 85% तक है। रूस ने भारत को कई महत्त्वपूर्ण हथियार प्रदान किये हैं जिसमें परमाणु पनडुब्बी, विमान वाहक पोत, युद्ध टैंक, बंदूकें, लड़ाकू जेट विमान और मिसाइलें शामिल हैं।
वर्ष 2000 से 2020 के बीच, भारत ने 66.5% हथियार रूस से प्राप्त किये। इस अवधि में भारत द्वारा हथियारों के आयात पर खर्च किये गए लगभग 53 बिलियन डॉलर में से लगभग 35 बिलियन डॉलर का भुगतान रूस को किया गया। इसी दौरान अमेरिका से 4.4 बिलियन डॉलर, जबकि इज़राइल से 4.1 बिलियन डॉलर की रक्षा सामग्री का आयात किया गया।
लेकिन वर्ष 2016-20 के बीच भारतीय हथियारों के आयात में रूस की भागीदारी कम होकर लगभग 50% रह गई है, इसके बावजूद हथियारों के लिए भारत की सबसे अधिक निर्भरता रूस पर बनी हुई है।
वैश्विक परिदृश्य में अगर देखा जाए तो संयुक्त राज्य अमेरिका के पश्चात् रूस विश्व का दूसरा सबसे बड़ा हथियार निर्यातक देश है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के अनुसार, वर्ष 2016-20 के मध्य वैश्विक हथियारों के व्यापार में अमेरिका की भागीदारी 37% जबकि रूस की 20% है।
रक्षा क्षेत्र में रूसी हथियार
भारत को पहली पनडुब्बी 1967 में सोवियत संघ से ही प्राप्त हुई थी। फॉक्सट्रॉट क्लास (Foxtrot Class) की यह पनडुब्बी आई.एन.एस. कलवरी के रूप में भारतीय नौसेना में शामिल की गई।
वर्तमान में नौसेना के पास कुल 16 पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों में से 8 सोवियत मूल की किलो क्लास (Kilo class) की हैं।
नौसेना के 10 गाइडेड-मिसाइल विध्वंसक में से 4 रूस के काशीन वर्ग (Kashin class) से हैं। साथ ही, 17 युद्धपोतों में से 6 रूसी तलवार वर्ग (Talwar class) के हैं।
नौसेना में शामिल एकमात्र विमान वाहक पोत ‘आईएनएस विक्रमादित्य’ सोवियत संघ द्वारा निर्मित कीव-श्रेणी (Kiev-class) का पोत है।
भारतीय वायु सेना का 667-प्लेन फाइटर ग्राउंड अटैक (FGA) बेड़े का 71% रूसी मूल (39% Su-30, 22 % मिग-21, 9% मिग-29) से संबंधित है।
लड़ाकू विमानों में शामिल सुखोई और मिग जेट को रूस से प्राप्त किया गया हैं। इसके अतिरिक्त, भारतीय सेना के सभी छह एयर टैंकर रूस निर्मित IL-78 हैं।
ब्रह्मोस एक प्रमुख क्रूज़ मिसाइल है, जिसे रूस और भारत ने संयुक्त रूप से विकसित किया है। भारत जल्द ही ब्रह्मोस मिसाइल का निर्यात फिलीपिंस को शुरू करने वाला है।
इसके अलावा, भारतीय सेना का मुख्य युद्धक टैंक बल मुख्य रूप से रूस के T-72M1 (66%) और T-90 (30%) से बना है।
रक्षा समझौतों पर संकट
रूस-यूक्रेन संघर्ष की स्थिति में पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए जा रहे है, जिससे भारत के मौजूदा रक्षा सौदे संकट में पड़ सकते हैं।
दोनों देशों के मध्य सबसे महत्त्वपूर्ण रक्षा समझौता अत्याधुनिक एस-400 ट्रायम्फ वायु-रक्षा प्रणाली है। भारत ने वर्ष 2018 में लगभग 5 बिलियन डॉलर का समझौता किया था। इसकी पहली इकाई 2021 में प्राप्त हो चुकी है, जिसे पंजाब में तैनात किया गया है।
दोनों देशों ने उत्तर प्रदेश के अमेठी में लगभग 6 लाख AK203 राइफल के निर्माण हेतु समझौता किया है।
भारत दो परमाणु पनडुब्बियों चक्र 3 और चक्र 4 को पट्टे पर प्राप्त करने के लिये रूस के साथ बातचीत कर रहा है। इससे पहले भारतीय नौसेना में आईएनएस चक्र 1 और आईएनएस चक्र 2 रूसी पोत को शामिल किया जा चुका है।
रक्षा क्षेत्र में बदलती प्रवृत्तियां
हालिया वर्षों में भारत ने रूस के रक्षा सामग्रियों पर अपनी निर्भरता को कम करने का प्रयास किया है। इस हेतु भारत अन्य देशों से रक्षा समग्रियों के आयात के साथ-साथ घरेलू स्तर पर भी रक्षा सामग्रियों के विकास पर ध्यान दे रहा है।
सीपरी के रिपोर्ट के अनुसार 2011-15 और 2016-20 के बीच भारत द्वारा हथियारों के आयात में 33% की गिरावट आई है।
इसके बावजूद 2011-15 और 2016–20 के दौरान रूस भारत का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता देश बना हुआ है। हालांकि, दो अवधियों के बीच रूस से आयात में 53% की कमी आई है और कुल हथियारों के आयात में रूस का हिस्सा 70 से 49% तक कम हो गया है।
वर्ष 2011-15 के मध्य अमेरिका भारत का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता देश था, लेकिन वर्ष 2016-20 में अमेरिका से हथियारों का आयात 2011-15 की तुलना में 46% कम हो गया और अमेरिका भारत का चौथा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता देश बन गया। इस दौरान रूस, फ्रांस और इज़राइल भारत के क्रमशः पहले, दूसरे और तीसरे सबसे बड़े हथियार आपूर्तिकर्ता देश थे।
आगे की राह
भारत के दशकों पुराने अंतर्राष्ट्रीय संबंध में रूस ने लगभग हर अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत के रुख का समर्थन किया है चाहे वह सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता हो या कश्मीर का मुद्दा।
वर्तमान में निर्विवाद रूप से भारत के सैन्य शक्ति का आधार रूसी हथियार हैं जिसका कारण रूस के साथ दीर्घकालिक रक्षा समझौते एवं आपसी सहयोग रहा है।
वर्तमान में किसी भी क्षेत्र में एक देश पर बहुत अधिक निर्भरता को उचित नहीं माना जाता है क्योंकि अत्यधिक निर्भरता आपकी विदेश नीति की संप्रभुता के साथ समझौता करने को विवश करती है।
भारत जैसे एक लोकतांत्रिक एवं संप्रभु राज्य के लिए यह आवश्यक है कि न केवल रक्षा बल्कि अन्य सभी क्षेत्रों में निर्भरता को कम करने का प्रयास किया जाए। यहीं कारण है कि हाल के वर्षों में भारत अपने रक्षा सामग्रियों में विविधता लाने के लिये निरंतर प्रयासरत हैं। जिसका प्रभाव हमें अमेरिका, फ़्रांस एवं इजराइल के साथ होने वाले हालिया रक्षा समझौते के रूप में दिखाई देता है।
