हाल ही में, ‘जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल’ (IPCC) ने अपनी छठी आकलन रिपोर्ट का दूसरा भाग क्लाइमेट चेंज 2022: इंपैक्ट, एडप्टेशन और वल्नरबिलिटी (Climate Change 2022: Impacts, Adaptation and Vulnerability) को जारी किया है।
इस रिपोर्ट में पहली बार अनुकूलन समर्थन (Adaptation Support) के लिये ‘जलवायु न्याय’ (Climate Justice) और समानता (Equity) को प्रमुख तत्त्वों के रूप में मान्यता दी गई है।
वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव : रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु
प्राकृतिक आपदाएँ:
इस रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों के अधिक गंभीर एवं व्यापक होने की चेतावनी दी गई है। प्राणियों के साथ-साथ प्राकृतिक प्रणालियों (Natural Systems) का बढ़ते तापमान के प्रति अनुकूलन की क्षमता लगातार कम हो रही है।
- रिपोर्ट में पहली बार जलवायु परिवर्तन के क्षेत्रीय प्रभावों का आकलन किया गया है। इसमें विश्व के बड़े शहरों के जोखिमों और उनकी कमियों का मूल्यांकन शामिल हैं।
- वैश्विक आबादी के लगभग 45% लोग (करीब 3.5 बिलियन से अधिक) जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्रों में रहते हैं। इन क्षेत्रों में अगले दो दशकों के दौरान गंभीर प्राकृतिक आपदाओं की चेतावनी दी गई है।
- यदि पूर्व-औद्योगिक समय से 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर तापमान को बनाए रखने के लिये पर्याप्त प्रयास कर लिया जाए, तो भी जलवायु परिवर्तन जनित आपदाएं अगले दो दशकों के दौरान पृथ्वी के विभिन्न हिस्सों में उभरने की संभावना है, यदि इस सीमा का उल्लंघन होता है, तो और अधिक गंभीर प्रभाव उत्पन्न होंगे।
- वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन कटौती के लक्ष्यों को प्राप्त करने की स्थिति में 21वीं सदी के अंत तक समुद्र का स्तर 44cm-76cm तक बढ़ जाएगा। लेकिन अधिक कार्बन उत्सर्जन की स्थिति में ग्लेशियरों के तेज़ी से पिघलने के कारण समुद्र का स्तर इस सदी के अंत तक 2 मीटर और वर्ष 2150 तक 5 मीटर तक बढ़ सकता है।
कृषि संकट
- जलवायु परिवर्तन का प्रभाव सीधे तौर पर कृषि एवं खाद्य उत्पादन पर पड़ेगा। भारत सहित अफ्रीका के अनेक देशों में खाद्य उत्पादन गंभीर रूप से प्रभावित होगा। हालांकि कुछ उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में कृषि पर सकारात्मक प्रभाव भी होगा लेकिन यह घटती उत्पादकता की क्षतिपूर्ति करने के लिये पर्याप्त नहीं होगी।
- सदी के अंत तक यदि तापमान में 1.6 डिग्री सेल्सियस से कम की वृद्धि होगी तो भी लगभग 8% कृषि भूमि खाद्य उत्पादन के लिये अनुपयुक्त हो जाएगी।
- भुखमरी का सबसे अधिक प्रभाव अफ्रीका, दक्षिण एशिया और मध्य अमेरिका पर पड़ेगा। ऐसा माना जा रहा है कि 2050 तक जलवायु परिवर्तन के कारण 18.3 करोड़ लोग कुपोषण का शिकार हो सकते हैं।
- तापमान वृद्धि का प्रभाव पशु एवं मत्स्य पालन दोनों पर पड़ेगा। एक अनुमान के अनुसार अफ्रीका के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में स्थानीय मछलियों में कमी के कारण सदी के अंत तक समुद्री मत्स्य उत्पादन में 41% तक की कमी हो सकती है।
- बढ़ते तापमान के कारण अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में कुपोषण के शिकार लोगों में कई गुना वृद्धि हो सकती है। विदित है कि मछलियां अफ्रीका में रहने वाले करीब एक-तिहाई लोगों के प्रोटीन का प्रमुख स्रोत एवं 1.23 करोड़ लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन हैं।
जल संकट
- यदि पृथ्वी के तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है तो विश्व के लगभग 300 करोड़ लोगों को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ेगा जबकि 4 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने पर यह बढ़कर 400 करोड़ से भी अधिक हो जाएगा।
- रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण अमेरिका और दक्षिण एशिया में आबादी के बड़े भाग को जल की कमी का सामना करना पड़ेगा। दक्षिण एशिया में भारत जैसे देशों के लिये यह समस्या ज्यादा गंभीर होगी जहाँ एक बड़ी आबादी जल के लिये हिमनदों से निकलने वाली नदियों पर निर्भर हैं।
स्वास्थ्य पर प्रभाव
- इस रिपोर्ट में पहली बार जलवायु परिवर्तन के स्वास्थ्य प्रभावों पर ध्यान दिया गया है। जलवायु परिवर्तन से वेक्टरजनित और जलजनित बीमारियों जैसे- मलेरिया एवं डेंगू का खतरा बढ़ा है, जिसके प्रति एशिया के उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र विशेष रूप से संवेदनशील है।
- जलवायु परिवर्तन से बढ़ती हीटवेव, बाढ़, सूखे जैसी मौसमीय घटनाओं की तीव्रता के कारण कुपोषण, एलर्जी संबंधी बीमारियों और मानसिक विकारों में वृद्धि हो रही है।
भारत पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव : रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु
कृषि उत्पादन में कमी
- जलवायु परिवर्तन से देश के कृषि उत्पादन पर गंभीर प्रभाव पड़ने की चेतावनी दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, यदि पूर्व-औद्योगिक स्तर पर ग्लोबल वार्मिंग 1 डिग्री सेल्सियस से 4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाती है तो भारत में चावल के उत्पादन में गिरावट का प्रतिशत 10 से बढ़कर 30 प्रतिशत तक हो सकता है। इसके अतिरिक्त मक्के का उत्पादन 25 फीसदी से 70 फीसदी तक घट जाएगा।
प्राकृतिक आपदाएँ
- इस रिपोर्ट में भारत को जलवायु परिवर्तन के प्रति एक संवेदनशील देश माना गया है, जिसके कई महत्त्वपूर्ण शहरों को जलवायु संबंधी गंभीर जोखिमों जैसे- बाढ़, समुद्र स्तर में वृद्धि, लू, चक्रवात आदि का सामना करने की चेतावनी दी गई है।
- मुंबई में समुद्र के स्तर में वृद्धि और बाढ़ का उच्च जोखिम, जबकि अहमदाबाद में अर्बन हीट आइलैंड का गंभीर खतरा बताया गया है। इसके अतिरिक्त चेन्नई, भुवनेश्वर, पटना और लखनऊ सहित कई शहरों में गर्मी और उमस के खतरनाक स्तर की समस्या को भी रेखांकित किया गया है।
समुद्री जल स्तर में वृद्धि
- 21वीं सदी के मध्य तक भारत में लगभग प्रति वर्ष 35 मिलियन लोग तटीय बाढ़ का सामना कर सकते हैं। यदि कार्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण नहीं लगाया गया तो सदी के अंत तक 45-50 मिलियन आबादी को इस जोखिम का सामना करना पड़ेगा।
- आईपीसीसी ने चेतावनी दी है कि भारत में मुंबई के समुद्र स्तर में वृद्धि होने से 2050 तक वार्षिक रूप से लगभग 162 अरब डॉलर की क्षति होने का अनुमान है।
वेट-बल्ब तापमान
- देश के अधिकांश हिस्सों में अधिकतम वेट-बल्ब तापमान 25-30 डिग्री सेल्सियस है। लेकिन आगामी वर्षों में उत्तरी और तटीय भारत के कई हिस्से सदी के अंत में 31 डिग्री सेल्सियस के बेहद खतरनाक वेट-बल्ब तापमान तक पहुंच जाएंगे।
- यदि उत्सर्जन में वृद्धि जारी रहती है, तो भारत के अधिकांश हिस्सों में यह तापमान 35 डिग्री सेल्सियस की असहनीय सीमा तक पहुँच जाएगा या उससे अधिक हो जाएगा।
वेट-बल्ब तापमान क्या है: वेट-बल्ब तापमान (Wet-bulb Temperature) का उपयोग गर्मी और आर्द्रता दोनों को मापने के लिये किया जाता है, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि वातावरण मनुष्यों के लिए अनुकूल है या नहीं। वेट-बल्ब तापमान की उच्चतम सीमा सामान्यतः 35 डिग्री सेल्सियस को मानी जाती है। ध्यातव्य है कि तापमान बढ़ने पर मानव शरीर पसीने से खुद को ठंडा कर लेता है लेकिन यदि तापमान और आर्द्रता बहुत अधिक है, तो पसीना शरीर का तापमान कम नहीं कर पाता है और शरीर के ताप का खतरनाक स्तर तक बढ़ने की जोखिम बढ़ जाता है।
आई.पी.सी.सी. रिपोर्ट के बारे में:
- जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल (IPCC) की स्थापना 1988 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) और विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) द्वारा की गई थी। इस पैनल में भारत सहित 195 सदस्य शामिल हैं।
- यह जलवायु परिवर्तन पर मूल्यांकन रिपोर्ट को तैयार करता है जिसका उपयोग जलवायु नीतियों को विकसित करने के लिये किया जा सकता है।
- आईपीसीसी की मूल्यांकन रिपोर्टों के लिए प्रत्येक वर्ष प्रकाशित होने वाले हजारों वैज्ञानिक पत्रों का आकलन किया जाता है, ताकि जलवायु परिवर्तन के कारकों, इसके प्रभावों और भविष्य के जोखिमों के बारे में व्यापक निष्कर्ष प्रदान किया जा सके। आईपीसीसी अपना स्वयं का शोध नहीं करता है।
- विदित है कि अंतर्राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन वार्ताओं जैसे- पेरिस समझौते और क्योटो प्रोटोकॉल के निर्माण में इन रिपोर्टों की मुख्य भूमिका रही है।
- मानव निर्मित जलवायु परिवर्तन के बारे में अधिक से अधिक ज्ञान का निर्माण और प्रसार करने के कारण 2007 में आईपीसीसी को नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।
निष्कर्ष
आई.पी.सी.सी. ने अपनी रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों का उल्लेख किया है। अपनी मूल्यांकन रिपोर्ट में विश्व के देशों को यह चेतावनी दी है कि 2 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य का पीछा करना विनाशकारी एवं खतरनाक हो सकता है। इसके बजाए तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर बनाये रखने के लिये और अधिक सक्रिय कार्यवाही की आवश्यकता पर जोर दिया है।
