हाल ही में, स्थायी सिंधु आयोग की बैठक में भाग लेने के लिये भारत के 10 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने पाकिस्तान का दौरा किया है। इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व सिंधु जल के भारतीय आयुक्त (Indian Commissioner of Indus Waters) प्रदीप सक्सेना ने किया।
स्थायी सिंधु आयोग की बैठक:
- सिंधु जल संधि के अनुच्छेद VIII के अनुसार भारत और पाकिस्तान द्वारा वर्ष में कम से कम एक बार स्थायी सिंधु आयोग की बैठक का आयोजन करना होगा। पिछली बार आयोग की बैठक वर्ष 2021 में नई दिल्ली में हुई थी।
- पाकिस्तान द्वारा इस बार की बैठक में जम्मू और कश्मीर के चिनाब बेसिन में तीन भारतीय जलविद्युत परियोजनाओं- पाकल दुल परियोजना (1000 मेगावाट), लोअर कलनई परियोजना (48 मेगावाट) और किरू परियोजना (624 मेगावाट) पर अपनी आपत्तियां प्रस्तुत की गई है।
सिंधु जल संधि के बारे में :
- 1951 में दोनों देशों ने सिंधु और उसकी सहायक नदियों पर सिंचाई परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिये विश्व बैंक में आवेदन किया था। 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में दोनों देशों के बीच इस पर एक समझौता हुआ, जिस पर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान द्वारा हस्ताक्षर किये गए।
- विदित है कि समझौते के अंतर्गत सिंधु नदी की सहायक नदियों को पूर्वी और पश्चिमी नदियों में विभाजित किया गया। इसमें सतलज, ब्यास और रावी नदियों को पूर्वी नदी जबकि झेलम, चेनाब और सिंधु को पश्चिमी नदी कहा गया है।
संधि के प्रमुख प्रावधान:
- समझौते के अनुसार कुछ अपवादों को छोड़कर पूर्वी नदियों के पानी को भारत बिना रोकटोक के इस्तेमाल कर सकता है। जबकि पश्चिमी नदियों का पानी पाकिस्तान के लिए है लेकिन समझौते के भीतर इन नदियों के पानी के सीमित उपयोग का अधिकार भारत को भी दिया गया, जैसे- विद्युत उत्पादन, सिंचाई आदि।
- विदित है कि इस संधि के अनुलग्नक डी (Annexure D) में भारत को ‘रन ऑफ द रिवर’ जलविद्युत परियोजनाओं के लिये इनके प्रयोग की अनुमति दी गई है। इसके अलावा, भारत को पश्चिमी नदियों पर न्यूनतम भंडारण स्तर (3.75 एम.ए.एफ.) रखने की अनुमति भी प्रदान की गई है।
- इस संधि में एक स्थायी सिंधु आयोग की स्थापना का भी प्रावधान किया गया है। यह आयोग नदियों पर सूचनाओं के आदान-प्रदान, निरंतर सहयोग और संघर्षों के समाधान के लिये एक मंच के रूप में कार्य करता है।
- आई.डब्ल्यू.टी. तीन चरणों वाला विवाद समाधान तंत्र का भी प्रावधान करता है, जिसके प्रथम चरण में विवादों को स्थायी आयोग में हल किया जाता है। दूसरे चरण के तहत तटस्थ विशेषज्ञ (Neutral Expert) की नियुक्ति के लिये विश्व बैंक से सहायता ली जा सकती है। अंतिम विकल्प के रूप में मध्यस्थता न्यायालय (Court of Arbitration) में विवाद को ले जाया जा सकता है।
संधि के तहत उठाई गई आपत्तियां:
- पाकिस्तान ने पश्चिमी नदियों पर भारत की जलविद्युत और बाँध परियोजनाओं के संदर्भ में कई आपत्तियां उठाई हैं।किशनगंगा जल विद्युत परियोजना भारत की महत्त्वपूर्ण परियोजना है, जिसे लेकर पाकिस्तान ने आपत्तियां दर्ज कराई हैं।
- किशनगंगा को झेलम नदी की सहायक नदी ‘नीलम’ के नाम से भी जाना जाता है, जो जम्मू-कश्मीर से निकलती है और पाकिस्तान के नियंत्रण वाले कश्मीर में झेलम नदी से मिल जाती है।
- इस परियोजना को वर्ष 2007 में शुरू किया गया था, जिसे वर्ष 2016 तक पूरा होना था, लेकिन पाकिस्तान ने बाँध की ऊंचाई को लेकर आपत्ति की, जिसके पश्चात् भारत बाँध की ऊंचाई को 97 मीटर से 37 मीटर तक कम करने पर सहमत हुआ।
- पाकिस्तान ने वर्ष 2016 और 2018 में विश्व बैंक से संपर्क किया तथा परियोजना की डिजाइन पर फिर से आपत्ति प्रकट की। लेकिन पाकिस्तान के लगातार विरोध के बावजूद भारत ने वर्ष 2018 में अपनी महत्त्वाकांक्षी परियोजना का उद्घाटन कर दिया है।
- पड़ोसी देश द्वारा चिनाब नदी पर निर्मित 900 मेगावाट की बगलिहार जलविद्युत परियोजना का भी विरोध किया गया। विदित है कि इस परियोजना पर तटस्थ विशेषज्ञ (Neutral Expert) ने 2007 में अपना फैसला सुनाते हुए भारत को इसके क्रियान्वयन की मंजूरी प्रदान कर दी।
भू-राजनीतिक तनाव के बीच सिंधु जल संधि:
- हाल के वर्षों में, भारत और पाकिस्तान के बीच भू-राजनीतिक तनाव के दौरान सिंधु जल संधि एक मुद्दा बनकर उभरा है।
- वर्ष 2016 में जम्मू-कश्मीर में उरी सैन्य शिविर पर हुए हमले तथा 2019 में पुलवामा में हुए आत्मघाती हमले के पश्चात् भारत ने स्थायी सिंधु आयोग की वार्ता को निलंबित कर दिया था, साथ ही संधि से बाहर होने की चेतावनी भी दी थी।
- ध्यातव्य है कि इस समझौते के नियमों के अनुसार कोई भी देश एकतरफा इस संधि को रद्द या बदल नहीं सकता है। दोनों देश मिलकर इस संधि में बदलाव कर सकते हैं या कोई नया समझौता कर सकते हैं।
