हाल ही में मध्य प्रदेश के इंदौर में एशिया के सबसे बड़े बायो-सीएनजी (Bio Compressed Natural Gas : Bio-CNG) संयंत्र का उद्घाटन किया गया है।
बायोमास, अवायवीय पाचन (Anaerobic Digestion) प्रक्रिया द्वारा ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में मुख्य रूप से कार्बनिक पदार्थ मीथेन (CH₄ – 55-65%) और कार्बन डाइऑक्साइड (CO2 – 35-45%) के मिश्रण में बदल जाते हैं जिसे आमतौर पर बायोगैस कहा जाता है।
इस प्रक्रिया में उत्पादित CO2 की मात्रा बायोमास के निर्माण के समय कैप्चर की गई CO2 की मात्रा के बराबर होती है जिसके कारण ही बायोगैस को कार्बन न्यूट्रल माना जाता है।
मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड के अलावा, बायोगैस में जल वाष्प, हाइड्रोजन सल्फाइड (H₂S), अमोनिया जैसी अशुद्धियाँ भी होती हैं
इन अशुद्धियों की क्षयकारी (Corrosive) शक्ति के कारण बायोगैस को वाहनों में ईंधन के रूप में उपयोग करना ठीक नहीं होता है। क्योंकि इसका उपयोग ऑटोमोबाइल में धातु के हिस्सों के क्षरण का कारण बन सकता है, जिससे वाहनों की रखरखाव लागत बढ़ जाती है।
बायोगैस में मौजूद इन अशुद्धियों को अवशोषित या साफ़ करने से गैस की प्रति यूनिट मात्रा में मीथेन बढ़ जाती है जिसे बायोमीथेन कहते हैं।
जब इस गैस को संसाधित एवं और अधिक शुद्ध करके संपीड़ित किया जाता है तब इसे जैव संपीड़ित प्राकृतिक गैस (बायो-सीएनजी) कहा जाता है जो संरचना और गुणों के मामले में प्राकृतिक गैस के समान होती है। इस गैस को कंप्रेस्ड बायो-गैस (सीबीजी) भी कहा जाता है।
बायो-सीएनजी में लगभग 92-98% मीथेन और केवल 2-8% कार्बन डाइऑक्साइड होती है। हानिकारक तत्त्वों का अभाव, उच्च मीथेन और कैलोरी मान के कारण बायो- सीएनजी ऑटोमोबाइल और बिजली उत्पादन के लिए एक आदर्श ईंधन होता है।
