प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने केन-बेतवा नदी को आपस में जोड़ने की परियोजना के लिये वित्तपोषण तथा क्रियान्वयन को मंजूरी दे दी है।
केन-बेतवा लिंक परियोजना की कुल लागत 44,605 करोड़ रुपये का अनुमान किया गया है, जो 2020-21 की कीमतों के आधार पर है।
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने परियोजना के लिये केंद्रीय समर्थन के रूप में 39,317 करोड़ रुपये, सहायक अनुदान के रूप में 36,290 करोड़ रुपये और ऋण के रूप में 3,027 करोड़ रुपये की धनराशि को मंजूर किया है। परियोजना को आठ वर्षों में क्रियान्वित कर लेने का प्रस्ताव है।
इस परियोजना के तहत केन का पानी बेतवा नदी में भेजा जायेगा। यह दाऊधाम बांध के निर्माण तथा दोनों नदियों से नहर को जोड़ने, लोअर उर परियोजना, कोठा बैराज और बीना कॉम्प्लेक्स परियोजना के जरिये पूरा किया जायेगा।
पृष्ठभूमि:
केन-बेतवा उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश दोनों राज्यों के जल संकट को दूर करने वाली नदी जोड़ो परियोजना है, जो कई सालों से अटकी हुई थी। यह नदियों को आपस में जोड़ने की राष्ट्रीय स्तर पर पहली परियोजना है।
इस परियोजना में केन नदी के पानी को बेतवा नदी में स्थानांतरित किया जाएगा। ये दोनों यमुना की सहायक नदियाँ हैं।
केन-बेतवा लिंक परियोजना के दो चरण हैं। फेज- I के तहत मध्य प्रदेश के पन्ना ज़िले में केन नदी पर दाऊधाम बाँध परिसर का निर्माण किया जाएगा। जबकि चरण- II में, लोअर उर परियोजना, कोठा बैराज और बीना संकुल बहुउद्देश्यीय परियोजना का निर्माण किया जाएगा।
इस परियोजना से बुंदेलखंड क्षेत्र के 13 ज़िले लाभान्वित होंगे। जिसमें मध्य प्रदेश के पन्ना, टीकमगढ़, छतरपुर, सागर, दमोह, दतिया, विदिशा, शिवपुरी और रायसेन ज़िले तथा उत्तर प्रदेश के बांदा, महोबा, झांसी और ललितपुर ज़िले शामिल हैं।
इस परियोजना से प्रति वर्ष 10.62 लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्र में सिंचाई एवं लगभग 62 लाख लोगों को पेयजल आपूर्ति की सुविधाएं प्राप्त होगी। साथ ही, 103 मेगावाट जल विद्युत का उत्पादन भी होगा। यह परियोजना बुंदेलखंड क्षेत्र में पानी की भयंकर कमी से प्रभावित लोगों के लिए अत्यधिक लाभकारी होगी।
नदी जोड़ो परियोजना का इतिहास :
भारत की नदियों को जोड़ने का प्रस्ताव पहली बार ब्रिटिशकाल में इंजीनियर सर आर्थर कॉटन ने 1858 में दिया था, लेकिन उस समय इस प्रस्ताव पर कोई प्रगति नहीं हो सकी।
इसके बाद 1970 के दशक में तत्कालीन केंद्रीय सिंचाई मंत्री डॉ. के.एल. राव द्वारा नदी से अधिशेष जल को जल की न्यूनता वाले क्षेत्र में स्थानांतरित करने का विचार दिया गया था। डॉ. राव ने इस हेतु एक राष्ट्रीय जल ग्रिड के निर्माण का सुझाव दिया।
इसके बाद नदी जोड़ो परियोजना की चर्चा पुनः 1980 में शुरू हुई, जब केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने नेशनल परस्पेक्टिव फॉर वाटर रिसोर्सेज डेवलपमेंट नामक एक रिपोर्ट को प्रस्तुत किया गया।
इस रिपोर्ट में राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (एनएनपी) को तैयार किया गया। इसमें नदी जोड़ो परियोजना को दो हिस्सों- हिमालयी और प्रायद्वीप में बांटा गया था।
1982 में एक पंजीकृत सोसाइटी के रूप में सिंचाई मंत्रालय (वर्तमान में जल शक्ति मंत्रालय) के अधीन नेशनल वाटर डेवलपमेंट एजेंसी के रूप में विशेषज्ञों की एक संस्था बनाई गई। यह एजेंसी नदियों को आपस में जोड़ने से संबंधित विषयों पर व्यापक अध्ययन का कार्य करती है।
नदियों को आपस में जोड़ने के काम की व्यावहारिकता की जाँच करने के लिए 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक कार्य दल को गठित किया।
इसके बाद यह परियोजना 2012 में पुनः ख़बरों में आई, जब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर समयबद्ध तरीके से कार्य करने का निर्देश दिया, ताकि देरी के कारण इसकी लागत में वृद्धि न हो।
वर्तमान में केन-बेतवा लिंक के संबंध में केंद्र सरकार के साथ उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सरकारों के मध्य हुए समझौते के बाद यह परियोजना आखिरकार जमीन पर उतरने वाली है।
नदी जोड़ो परियोजना के लिए मंजूरी :
आमतौर पर, नदी परियोजनाओं क्रियान्वयन के लिए निम्नलिखित प्रकार की मंजूरी की आवश्यकता होती है-
- तकनीकी एवं आर्थिक मंजूरी- केंद्रीय जल आयोग द्वारा
- वन एवं पर्यावरण मंजूरी- पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा
- आदिवासी जनसंख्या की पुनर्वास योजना-जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा
- वन्यजीव मंजूरी- केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति
नदी जोड़ो परियोजना का महत्त्व :
भारत के पास दुनिया का केवल 4 फीसदी जल है, जबकि आबादी का भार लगभग 18 फीसदी है। ऐसे में भारत को जल का व्यापक प्रबंधन करने की जरूरत है।
भारत में वर्षा का स्वरूप बहुत ही विषम है। यहां लगभग 100 दिनों में अधिकांश वर्षा होती है। इसके अलावा, भौगोलिक विविधताओं के कारण भारत में दुनिया के कुछ सबसे सूखे और आर्द्र स्थान दोनों विद्यमान हैं।
नदियों को आपस में जोड़ने से जल अधिशेष वाले क्षेत्रों से अतिरिक्त जल को कमी वाले और सूखा प्रभावित क्षेत्रों में स्थानांतरित किया जा सकेगा।
इन परियोजनाओं से देश में सूखे की समस्या का स्थायी हल मिल सकेगा। एक अनुमान के अनुसार नदियों को जोड़ने से संबंधित कुल 30 परियोजनाओं के पूर्ण होने के बाद लगभग 15 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि पर सिंचाई हो सकेगी।
यह भी माना जा रहा है कि नदियों को जोड़ने के पश्चात् गंगा, ब्रह्मपुत्र जैसी बड़ी नदियों के कैचमेंट एरिया में प्रत्येक वर्ष आने वाली बाढ़ की समस्या से भी मुक्ति मिल सकेगी क्योंकि नदियों के अधिशेष जल को प्रयोग में लाने की व्यवस्था विद्यमान होगी।
इन परियोजनाओं के क्रियान्वयन से लगभग 34 हजार मेगावॉट बिजली का भी उत्पादन हो सकेगा, जो देश की ऊर्जा आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए बहुत महत्त्वपूर्ण है।
नदी जोड़ो परियोजना से जुड़ी चुनौतियाँ :
केन और बेतवा के कैचमेंट एरिया में औसतन 90 सेंटीमीटर वर्षाजल की प्राप्ति होती है। विदित है कि सूखे के समय में दोनों नदियों की बेसिन में जल की उपलब्धता बहुत ही कम हो जाती है, जिसके कारण जलसंकट दोनों नदियों में ही बढ़ जाता है।
केन-बेतवा लिंक परियोजना के अंतर्गत निर्मित दाऊधाम बाँध के डूब क्षेत्र में आने वाले 6,017 हेक्टेयर क्षेत्र में से 4,206 हेक्टेयर क्षेत्र पन्ना टाइगर रिजर्व के भीतर स्थित है।
इस परियोजना के डूब क्षेत्र में केन-घड़ियाल अभयारण्य भी अवस्थित है, जो परियोजना के लागू होने के बाद जलमग्न हो जाएगा।
इन परियोजना से नदियों में जल की आवश्यक मात्रा में कमी आ सकती है, जिससे नदी का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित हो सकता है।
नदी के जल को दूसरी नदी की तरफ मोड़े जाने से समुद्र की तरफ जा रहे नदी के जल में कमी आएगी, जिससे समुद्र के पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। इससे समुद्र की खाद्य श्रृंखला प्रभावित हो सकती है।
जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे है। ऐसी परिस्थिति में जब भविष्य में हिमालयी नदियों के जल में ही कमी आने का अंदेशा है, तब इन नदी जोड़ो परियोजनाओं का कोई महत्त्व नहीं रह जाएगा।
राज्यों के बीच पानी को लेकर पहले से ही टकराव चल रहे हैं। सतलुज-यमुना लिंक नहर का मुद्दा कई दशकों से न्यायालय में फंसा हुआ है। इन नदी जोड़ो परियोजनाओं से राज्यों के मध्य नदी विवादों के बढ़ने की आशंका है।
समाधान :
जल प्रबंधन के लिए बड़ी नदी जोड़ो परियोजनाओं के स्थान पर छोटे जल तंत्रों को आपस में जोड़ा जाना चाहिए, जिससे नदी जोड़ो परियोजनाओं के लाभ-दोषों को भी भली-भांति समझा जा सकेगा।
नदी के पर्यावरणीय प्रवाह पर व्यापक अध्ययन किए जाने की आवश्यकता है, ताकि नदीतंत्र के जीव-जंतुओं और पादप प्रजातियों पर विपरीत प्रभाव न पड़े।
इन परियोजनाओं को लागू करने का मुख्य उद्देश्य कृषि क्षेत्र में लाभ प्रदान करना है, लेकिन कृषि के लिए सूक्ष्म सिंचाई जैसी तकनीकों एवं चेक डैम जैसे परम्परागत जल संरक्षण के उपायों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। जिससे जल के न्यूनतम प्रयोग से अधिकतम उत्पादन को प्राप्त किया जा सके।
सूखा प्रभावित क्षेत्रों में वर्षा के जल को संरक्षित करने हेतु जल शक्ति अभियान: कैच द रेन जैसे प्रयासों को अपनाने की जरूरत है।
भविष्य की राह :
केन-बेतवा लिंक परियोजना पर हाल ही में संपन्न यह समझौता नदी परियोजनाओं को आपस में जोड़ने का मार्ग प्रशस्त करेगा ताकि देश के विकास में पानी की कमी एक अवरोधक न बन सके।
इन परियोजनाओं से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों पर भी व्यापक अध्ययन किया जाना चाहिए, क्योंकि कोई भी विकास कार्य पर्यावरण की कीमत पर नहीं किया जा सकता।
इस हेतु वर्षा जल के संरक्षण हेतु पर्याप्त प्रबंधन किये जाने पर ध्यान देने की आवश्यकता है। हमें ऐसी परियोजना से बचना चाहिए जो जंगलों का नाश करें, लोगों का विस्थापन करें और जलवायु परिवर्तन के बुरे प्रभावों में और तेजी लाएं।
चर्चित पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र के अनुसार जितनी राशि नदियों को जोड़ने में खर्च की जानी है उससे कहीं कम अगर बारिश का पानी रोकने और नदियों और तालाबों को बचाने में खर्च करें तो जल की समस्या को हल किया जा सकता है। इस प्रकार देश में पानी की समस्या का हल वास्तव में सही तरीके से जल का प्रबंधन करने में है।
