(Hydrogen: The Energy of Future)

दुनिया अंतर्राष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं को प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर है और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए निरंतर प्रयासरत है। ऐसे में हाइड्रोजन की महत्ता दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है, क्योंकि यह एक ऐसे पारंपरिक ईंधन का स्रोत है जो स्वच्छ ऊर्जा की आवश्यकता की पूर्ति कर सकता है।

हाइड्रोजन को भविष्य की ऊर्जा माना जा रहा है, जिसमें जीवाश्म ईंधन को प्रतिस्थापित करने की क्षमता है। इसके उपयोग से कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन को कम किया जा सकता है जिससे जलवायु परिवर्तन के खतरे पर भी नियंत्रण संभव है।

इस ऊर्जा का प्रयोग परिवहन क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि रसायन, इस्पात, लौह, उर्वरक आदि उद्योगों में भी इसका उपयोग किया जाएगा। साथ ही, इसके प्रयोग से भविष्य में ऊर्जा की माँग में होने वाली वृद्धि को भी पूरा किया जा सकेगा।

वर्तमान में भारत के विद्युत उत्पादन का अधिकांश भाग कोयले से उत्पादित होता है। अतः हाइड्रोजन ऊर्जा की शुरुआत से जीवाश्म ईंधन को प्रतिस्थापित किया जाएगा, जिससे भविष्य में प्रदूषण के स्तर और तेल-मूल्य वृद्धि को नियंत्रित किया जा सकेगा।

इस प्रकार हाइड्रोजन के रूप में पृथ्वी पर विद्यमान सबसे प्रचुर तत्त्व की ऊर्जा क्षमता को प्राप्त करने तथा परिवहन क्षेत्र में क्रांति लाने के लिए हाइड्रोजन ऊर्जा पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।

हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था एवं हाइड्रोजन ऊर्जा (Hydrogen Economy and Hydrogen Energy)

हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था (हाइड्रोजन इकोनॉमी) से आशय अर्थव्यवस्था की एक ऐसी प्रणाली से है जिसमें ऊर्जा आवश्यकताओं की अधिकांश पूर्ति हाइड्रोजन से होगी। ‘हाइड्रोजन इकोनॉमी’ शब्द का पहली बार प्रयोग जॉन बॉक्रीस ने 1970 में किया था। उन्होंने बताया था कि हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था वर्तमान हाइड्रोकार्बन अर्थव्यवस्था का स्थान ले सकती है, जिससे एक स्वच्छ एवं प्रदुषण मुक्त वातावरण निर्मित हो सकता है।

हाइड्रोजन एक कार्बन-शून्य ईंधन है, जिसे स्वच्छ ऊर्जा का एक प्रमुख स्रोत माना जाता है। यह ऊर्जा का एकमात्र स्रोत है जो केवल जल वाष्प का उत्सर्जन करता है और वातावरण में कोई जहरीला अवशेष नहीं छोड़ता है।

इसे सौर एवं पवन ऊर्जा के अक्षय स्रोतों से उत्पादित किया जा सकता है। हाइड्रोजन ऊर्जा के उत्पादन के अन्य तरीकों में प्राकृतिक गैस शोधन (Natural Gas Reforming) और इलेक्ट्रोलिसिस विधि (किसी रासायनिक यौगिक में विद्युत-धारा प्रवाहित कर उसके रासायनिक बंधों को तोड़ने की प्रक्रिया) प्रयुक्त होती है।

हाइड्रोजन ऊर्जा के प्रकार (Types of Hydrogen Energy)
ग्रे हाइड्रोजन: यह जीवाश्म ईंधन से प्राप्त होता है, इसका उप-उत्पाद कार्बन डाई ऑक्साइड है।   ब्लू हाइड्रोजन: यह भी जीवाश्म ईंधन से प्राप्त होता है। लेकिन इससे निकलने वाले उप-उत्पाद कार्बन मोनो ऑक्साइड और कार्बन डाई ऑक्साइड को अवशोषित करके  संग्रहित कर लिया जाता है। इस प्रकार यह पर्यावरणीय रूप से ग्रे हाइड्रोजन से बेहतर होता है।   ग्रीन हाइड्रोजन: जल को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित करके ग्रीन हाइड्रोजन को प्राप्त किया जाता है। इसके उत्पादन के लिए नवीकरणीय स्रोतों जैसे सौर और पवन ऊर्जा से प्राप्त विद्युत ऊर्जा का प्रयोग किया जाता है। इसका उप-उत्पाद पानी और जलवाष्प है। यह एक स्वच्छ ईंधन का स्रोत है।

भारत में हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था (Hydrogen Economy in India)

हाइड्रोजन ऊर्जा के शुरूआती प्रयासों में वर्ष 2006 में नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने हाइड्रोजन ऊर्जा रोडमैप को तैयार करने के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति का गठन किया। इसके पश्चात् 2016 में मंत्रालय द्वारा गठित डॉ. के. कस्तूरीरंगन समिति ने हाइड्रोजन और फ्यूल सेल पर रिपोर्ट तैयार कर इस स्वच्छ ऊर्जा को अपनाने की सिफारिश की थी।

ऊर्जा के इस स्रोत पर ध्यान केंद्रित करते हुए भारत सरकार ने देश में हाइड्रोजन रोडमैप तैयार करने के लिए बजट 2021-22 में ‘राष्ट्रीय हाइड्रोजन ऊर्जा मिशन’ की घोषणा की है। यह मिशन हरित ऊर्जा स्रोतों से हाइड्रोजन ऊर्जा को उत्पन्न करने पर ध्यान केंद्रित करता है इस मिशन के माध्यम से 2022 तक 175 गीगावॉट अक्षय ऊर्जा क्षमता प्राप्त करने और 2050 तक डीकार्बोनाइजेशन करने के भारत के लक्ष्य को प्रोत्साहन मिलेगा।

यह मिशन अल्पावधि (4 वर्ष) के लिए विशिष्ट रणनीति और दीर्घकालिक (10 वर्ष तथा उससे अधिक) के लिए विशेष सिद्धांतों को सामने रखेगा। इस मिशन का उद्देश्य मूल्य श्रृंखला में हाइड्रोजन और फ्यूल सेल प्रौद्योगिकियों के निर्माण के लिए भारत को एक वैश्विक केंद्र के रूप में विकसित करना है।

वर्तमान में भारत में हाइड्रोजन सीएनजी (एच-सीएनजी) की पायलट परियोजनाओं पर काम हो रहा है। हाइड्रोजन को कंप्रेस्ड नेचुरल गैस (CNG) में मिलाकर हाइड्रोजन सीएनजी का उत्पादन किया जाता है, जिसका प्रयोग परिवहन ईंधन के रूप में तथा तेल शोधन से जुड़ी औद्योगिक इकाइयों में किया जा रहा है।

विदित है कि अक्टूबर 2020 में, एच-सीएनजी बसों का संचालन करने वाला दिल्ली पहला भारतीय शहर बन गया इस योजना को आगामी महीनों में भारत के अन्य प्रमुख शहरों में भी शुरू किया जाएगा।

इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन और एनटीपीसी लिमिटेड जैसी कंपनियां एच-सीएनजी की दिशा में काम कर रही हैं। इसका उत्पादन कार्बन कैप्चर प्रौद्योगिकी के साथ किया जाएगा जिसके परिणामस्वरूप ब्लू हाइड्रोजन का उत्पादन होगा।

सीएनजी पाइपलाइन बुनियादी ढाँचे के निर्माण से हाइड्रोजन के परिवहन हेतु प्रयास जारी हैं ताकि इसकी परिवहन लागत को कम किया जा सके। इसके अलावा, प्राकृतिक गैस के साथ इसकी तारतम्यता स्थापित होने से हाइड्रोजन को विभिन्न ऊर्जा विकल्पों के साथ मिलाया जा सकता है और इसके लिए बड़े बुनियादी ढाँचे को विकसित करने का इंतजार नहीं करना होगा।

ग्रीन हाइड्रोजन के लाभ (Benefits of Green Hydrogen)

हाइड्रोजन पृथ्वी का एक बुनियादी तत्त्व है जो प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होने के साथ ही ऊर्जा का एक अक्षय स्रोत है।

ग्रीन हाइड्रोजन अपने दहन या उत्पादन प्रक्रियाओं में प्रदूषणकारी गैसों का उत्सर्जन नहीं करता है और इसे आसानी से संग्रहित किया जा सकता है। इस प्रकार यह पर्यावरण की दृष्टि से एक अनुकूल स्रोत है।

इसे आसानी से विद्युत और सिंथेटिक गैस में परिवर्तित किया जा सकता है जो घरेलू, वाणिज्यिक, औद्योगिक उद्देश्यों के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है। इसे प्राकृतिक गैस के साथ अधिकतम 20 प्रतिशत तक मिलाया जा सकता है।

इसे रॉकेट में ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है क्योंकि यह शक्तिशाली और कुशल ऊर्जा का स्रोत है। अंतरिक्ष स्टेशनों में चालक दल के सदस्यों को पानी उपलब्ध कराने के लिए भी ग्रीन हाइड्रोजन का उपयोग किया जा सकता है।

यह डीजल या गैस की तुलना में बहुत अधिक कुशल ईंधन स्रोत है क्योंकि यह प्रति पाउंड ईंधन की अधिक ऊर्जा का उत्पादन कर सकता है। इसका उपयोग भारी परिवहन, विमानन और समुद्री परिवहन में भी किया जा सकता है।

ग्रीन हाइड्रोजन के नुकसान (Disadvantages of Green Hydrogen)

इलेक्ट्रोलिसिस के माध्यम से ग्रीन हाइड्रोजन को उत्पन्न करने के लिए वर्तमान में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत का उपयोग किया जाएगा, जिससे इसकी उत्पादन लागत में वृद्धि हो सकती है।

इसके उत्पादन में अन्य ईंधन की तुलना में अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। हाइड्रोजन को जल से अलग करने की तकनीक और प्रक्रिया अत्यंत जटिल एवं आर्थिक रूप से महँगी है।

यह एक अत्यंत अस्थिर और ज्वलनशील गैस है इसलिए रिसाव और विस्फोटों को रोकने के लिए इसे व्यापक सुरक्षा उपायों की आवश्यकता होती है।

निष्कर्ष (Conclusion)

वर्तमान में तेजी से बढ़ते वैश्विक तापन और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को रोकने के लिए हरित ईंधन को बढ़ावा देना अति आवश्यक है, ताकि भावी पीढ़ियों के लिए स्वच्छ पर्यावरण को सुनिश्चित किया जा सके। इसी उद्देश्य की प्राप्ति हेतु भविष्य की ऊर्जा के रूप में हाइड्रोजन ऊर्जा आधारित अर्थव्यवस्था का निर्माण करने का प्रयास तीव्रता से किया जा रहा है।

भारत अपने व्यापक प्रयासों के फलस्वरूप ऊर्जा स्रोतों को बदलने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। इस हेतु हाल ही में भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय हाइड्रोजन ऊर्जा मिशन की घोषणा की गई है, जो भारत की हाइड्रोकार्बन अर्थव्यवस्था को हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था में परिवर्तित करने की प्रतिबद्धता को प्रकट करता है।

By QuizHat

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