हाल ही में, नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने ‘इंडिया: ट्रांसफॉर्मिंग टू ए नेट-जीरो एमिशन एनर्जी सिस्टम’ नामक एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट को द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (TERI) और शेल (Shell) द्वारा संयुक्त रूप से तैयार किया गया है।

इस रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन पर कार्यवाही को तेज करने के उद्देश्य से भारत के ऊर्जा क्षेत्र के लिए नेट-जीरो उत्सर्जन (NZE) रणनीति पर व्यापक मूल्यांकन किया गया है।

जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के लिए सिर्फ कार्बन उत्सर्जन में कमी करना पर्याप्त नहीं होगा। बल्कि इसपर व्यापक रूप से नियंत्रण भी आवश्यक है। इसी को ध्यान में रखते हुए विश्व स्तर पर शुद्ध शून्य उत्सर्जन के लिए तेजी से प्रयास किए जा रहे हैं।

विदित है कि पेरिस जलवायु सम्मलेन (CoP-21) में ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करने के लिए पृथ्वी के औसत तापमान को पूर्व औद्योगिक स्तर से  2°C से नीचे रखने पर सहमति बनी है। इसके लिए इस सदी के मध्य तक वैश्विक औसत तापमान की वृद्धि को 1.5°C तक सीमित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

अक्टूबर 2018 में इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC)  द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार शुद्ध शून्य उत्सर्जन तक पहुंचने के लिए सदी के मध्य तक वैश्विक औसत तापमान की वृद्धि को 1.5ºC तक सीमित करने की आवश्यकता को बताया गया है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वैश्विक तापमान को स्थिर करने के लिए शुद्ध उत्सर्जन शून्य होना अनिवार्य है।

विदित है कि हिमालयी देश भूटान और सबसे अधिक वनाच्छादित देश सूरीनाम पहले से ही कार्बन नकारात्मक देश हैं। ये अपने कार्बन उत्सर्जन की तुलना में कहीं अधिक कार्बन को अवशोषित करते हैं। इस प्रकार ये देश शुद्ध नकारात्मक उत्सर्जन की श्रेणी में आते है, जो कार्बन के उत्सर्जन से अधिक बचत करते हैं।

शुद्ध शून्य उत्सर्जन क्या है?

शुद्ध शून्य उत्सर्जन से तात्पर्य सभी मानव निर्मित ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन को वायुमंडल से एक बराबर मात्रा में अवशोषित करके संतुलित किये जाने से है, जो वैश्विक तापमान को स्थिर करने में मदद करेगा।

शुद्ध शून्य उत्सर्जन की अवधारणा के अंतर्गत व्यापक रूप से शुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन, शुद्ध शून्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, कार्बन तटस्थता, डीप डीकार्बोनाइजेशन को शामिल किया जाता है।

वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट के अनुसार, जंगलों की पुनर्बहाली और डायरेक्ट एयर कैप्चर एंड स्टोरेज (DACS) तकनीक के माध्यम से पर्यावरण में विद्यमान ग्रीन हाउस गैसों को अवशोषित किया जा सकता है।

वन पर्यावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने का कार्य करते हैं, जो कार्बन सिंक के रूप में जाने जाते हैं। यही कारण है कि इन्हें जलवायु संकट का सामना करने के लिए प्रमुख सहायक माना जाता हैं।

अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में ऐसी प्रौद्योगिकियां मौजूद हैं जो उत्सर्जन को शून्य तक ला सकती हैं। विद्युत उत्पादन में अक्षय और परमाणु ऊर्जा स्रोतों का उपयोग, परिवहन प्रणाली में पेट्रोल-डीजल के स्थान पर विद्युत या हाइड्रोजन ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करके कार्बन उत्सर्जन को पूर्ण शून्य तक लाया जा सकता है।

ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन को कम करने के लिए किए जा सकने वाले निम्नलिखित प्रयास इस प्रकार हैं-

शुद्ध शून्य उत्सर्जन के लिए वैश्विक प्रयास

पेरिस जलवायु समझौता अपने हस्ताक्षरकर्त्ता देशों को 2050 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु अपनी प्रतिबद्धताओं को पांच से दस वर्षों की समय-सीमा में प्रस्तुत करने की बात कहता है।

2019 के संयुक्त राष्ट्र जलवायु कार्रवाई शिखर सम्मेलन में 77 देशों ने 2050 तक अपने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को शून्य के स्तर पर लाने की प्रतिबद्धता को व्यक्त किया था, जो वर्तमान में 100 देशों तक पहुंच चुका है।

यूनाइटेड किंगडम ने 2050 तक अपने शुद्ध शून्य उत्सर्जन लक्ष्य को प्राप्त करने की घोषणा की है, जिसके लिए उसने एक शुद्ध शून्य उत्सर्जन कानून भी पारित किया है।

इसके अलावा, यूरोपीय संघ ने अपने यूरोपीय जलवायु कानून में 2050 तक कार्बन तटस्थ होने के लिए अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता को सुनिश्चित करने पर सहमति व्यक्त की है।

सितंबर 2020 में चीन ने यह घोषित किया कि वह अपने जीएचजी उत्सर्जन के अधिकतम स्तर को 2030 तक प्राप्त कर लेगा और 2060 से पहले कार्बन तटस्थता को प्राप्त कर लेगा।

संयुक्त राज्य अमेरिका ने भी 27 जनवरी, 2021 को यह घोषणा की है कि वह 2050 तक शुद्ध शून्य अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है। एक ओर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने महत्वाकांक्षी उत्सर्जन लक्ष्यों में वैश्विक समुदाय को शामिल करने के लिए 22 अप्रैल, 2021 को प्रमुख उत्सर्जक राष्ट्रों के जलवायु शिखर सम्मेलन का आह्वान किया है, जिसमें भारत को भी आमंत्रित किया गया है।

वहीं दूसरी ओर ग्लासगो में नवंबर 2021 में आयोजित होने वाले 26वें संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (UNFCCC CoP 26) से पूर्व शुद्ध शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु सभी देशों पर दीर्घकालिक रणनीतियों (एलटीएस) को घोषित करने का नैतिक दबाव है।

विदित है कि पेरिस समझौते के तहत कार्बन उत्सर्जन से संबंधित अपनी दीर्घकालिक रणनीतियों को भारत ने अभी तक घोषित नहीं किया है।

भारत का दृष्टिकोण

शुद्ध शून्य उत्सर्जन के लक्ष्यों की घोषणा करने वाले देशों के क्लब में भारत के शामिल होने को लेकर वैश्विक कुटनीतिक दबाव बनाया जा रहा है। भारत के इस क्लब में शामिल होने से राष्ट्र के आर्थिक एवं सामाजिक विकास की गति और शामिल न होने से स्वच्छ पर्यावरण से जुड़े प्रयासों के प्रभावित होने की संभावना है।

भारत, चीन, अमेरिका और यूरोपीय संघ के बाद चौथा सबसे बड़ा वैश्विक ऊर्जा उपभोक्ता देश है। एक अनुमान के अनुसार भारत 2030 तक यूरोपीय संघ से आगे निकलकर ऊर्जा उपभोग के मामले में तीसरे स्थान पर आ जाएगा। इतने अत्यधिक कार्बन उत्सर्जन के बावजूद जहाँ भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन पदचिह्न केवल 2 टन CO2equivalent (CO2e) है, जो 4.8 टन के वैश्विक औसत की तुलना में बहुत कम है, वहीं ऑस्ट्रेलिया जैसे देश का प्रति व्यक्ति कार्बन पदचिह्न 17 टन है।

भारत द्वारा अपने उत्सर्जन लक्ष्यों को घोषित न करने के संदर्भ में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि विकसित देशों ने ऐतिहासिक रूप से अपने उचित हिस्से की तुलना में कहीं अधिक पर्यावरण का दोहन किया है। जबकि भारत अभी अपनी विशाल आबादी के लिए विकास की राह पर है। यहीं कारण है कि भारत ‘सामान्य लेकिन विभेदित जिम्मेदारी’(Common But Differentiated Responsibility) सिद्धांत को अपनाने की बात वैश्विक मंच पर उठाता रहा है।

इस सिद्धांत के अनुसार विकसित एवं औद्योगिक देशों को अपने अतीत में किए गए कार्बन उत्सर्जन के लिए ऐतिहासिक जिम्मेदारी एवं उत्तरदायित्व के अनुरूप कार्य करने की आवश्यकता है।

यह सिद्धांत जलवायु न्याय की अवधारणा को रेखांकित करता है, जिसके अनुसार जलवायु संकट की समस्या के समाधान के लिए अमीर और गरीब देशों को समान रूप से उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए विकसित देशों को अधिक बोझ उठाना होगा।

इस प्रकार यह सिद्धांत सम्पूर्ण विश्व को जलवायु संकट के समाधान के लिए जिम्मेदारी प्रदान करता है, लेकिन विकसित देशों पर विभेदित जिम्मेदारी देते हुए विकासशील और अल्प विकसित देशों की अपेक्षा अधिक उत्तरदायित्व देता है।

इसी सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए पेरिस समझौते के तहत विकसित देशों ने जलवायु वित्त के रूप में 100 अरब डॉलर प्रति वर्ष प्रदान करने की प्रतिबद्धता को व्यक्त किया था, ताकि विकासशील और अल्प विकसित देश जलवायु हितैषी कार्यवाही करने में सक्षम हो सकें। लेकिन विकसित देशों द्वारा अभी तक इस प्रतिबद्धता को पूर्ण नहीं किया गया है।

इसके अलावा, ऑस्ट्रेलिया, जापान, रूस जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाओं द्वारा प्रस्तुत दीर्घकालिक रणनीतियों (long-term strategies -LTS) के माध्यम से सदी के मध्य तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य की प्राप्ति पर भी संशय किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ ये देश भारत पर उत्सर्जन सीमा को निर्धारित करने का दबाव बना रहे हैं।

 भारत का योगदान

भारत को शुद्ध शून्य उत्सर्जन लक्ष्य की प्राप्ति हेतु स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों में तेजी लानी होगी। इस हेतु ऊर्जा प्रणाली में नवीकरणीय ऊर्जा की वृद्धि, ऊर्जा ग्रिडों के विद्युतीकरण का उच्च स्तर, लागत प्रभावी हरित हाइड्रोजन आधारित अर्थव्यवस्था की शुरूआत और बायोमास आधारित जैव ईंधन उत्पादन जैसे आयामों पर ध्यान देना होगा।

मौजूदा ऊर्जा प्रणाली को डीकार्बोनाइज करने के लिए भारत द्वारा कुछ महत्त्वपूर्ण कदम उठाये गये हैं।  इसके तहत 2030 तक अक्षय ऊर्जा उत्पादन क्षमता के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को 450 गीगावाट तक बढ़ा दिया गया है।

पर्यावरण में विद्यमान बड़ी मात्रा में कार्बन की मात्रा को हटाने के लिए भारत को कार्बन केप्चर जैसे कृत्रिम तकनीकों को अपनाना होगा। साथ ही, भारत में वनीकरण की वर्तमान दर जरूरत से कम है, जिसे बढ़ाकर हम अपनी कार्बन सिंक क्षमता को बढ़ा सकते है।

शुद्ध शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए राष्ट्रीय और उप राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट और सुसंगत नीतियों पर ध्यान देना होगा। केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के साथ ही सिक्किम राज्य के अलावा चेन्नई, बेंगलुरु और केरल के वायनाड में मीनांगडी की पंचायत द्वारा कार्बन तटस्थता के लिए योजना बनाई जा रही है।

पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियों से निपटने में सक्रीय भागीदारी के साथ ही भारत को कार्बन तटस्थ होने के लिए तकनीकी व्यवहार्यता, आर्थिक लागत और सामाजिक प्रभाव जैसे बिंदुओं पर भी ध्यान देना होगा।

निष्कर्ष

जलवायु न्याय की अवधारणा विश्व के सभी देशों को आर्थिक और सामाजिक विकास का अधिकार प्रदान करती है। इस अवधारणा के अनुसार जलवायु संकट का सामना करने हेतु विकसित देशों द्वारा अधिक जिम्मेदारियों को वहन करने के साथ ही विकासशील देशों को वित्त, प्रौद्योगिकी और क्षमता निर्माण की सहायता प्रदान करके जलवायु ऋण को चुकाने की आवश्यकता है।

वहीं दूसरी तरफ भारत को तृतीय विश्व के देशों का नेतृत्व करते हुए इस समूह में शामिल देशों की विकासात्मक गतिविधियों की आवश्यकता को वैश्विक मंच पर मजबूती से रखना होगा। साथ ही, जलवायु संकट से निपटने हेतु विकसित देशों से वित्त एवं प्रौद्योगिकी की आपूर्ति के लिए दबाव बनाना होगा, तभी आर्थिक विकास को बिना रोके सतत विकास की नींव को रखा जा सकता है।

By QuizHat

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