हाल ही में IISc, बेंगलुरु ने 3.3 पेटाफ्लॉप्स की क्षमता वाले सुपरकंप्यूटर ‘परम प्रवेग’ को शुरू किया है…
सुपरकंप्यूटर अत्याधुनिक और बेहद तेज गति से गणना करने वाले कंप्यूटर होते हैं जिनकी कार्यप्रणाली सामान्य कंप्यूटर से अलग होती है।
सामान्य कंप्यूटर जहाँ किसी गणना को क्रमबद्ध तरीके से प्रोसेस करके परिणाम प्राप्त करते हैं वही सुपरकंप्यूटर एक गणना को कई छोटे-छोटे भाग में बांटकर एक साथ प्रोसेस करता है जिससे इसकी गणना शक्ति एक सामान्य कंप्यूटर की तुलना में बहुत अधिक बढ़ जाती है।
किसी गणना को एक साथ प्रोसेस करने की तकनीक को समानांतर प्रसंस्करण (Parallel Processing) कहा जाता है, जो अनेको माइक्रो प्रोसेसर की सहायता से संम्पन्न की जाती है।
जहाँ एक सामान्य कंप्यूटर में 10 से कम माइक्रो प्रोसेसर होते हैं, वहीं सुपरकंप्यूटर में इनकी संख्या 1 लाख से भी अधिक हो सकती है। यही कारण है कि लाखों घटकों को एक साथ संयोजित करने एवं कार्य करने के लिए इन्हें अधिक स्थान, भंडारण क्षमता एवं अत्यधिक ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है।
इनकी गणना शक्ति को FLOPS (Floating Point Operations Per Second) में जबकि सामान्य कंप्यूटर की MIPS (Million Instructions Per Second) में मापी जाती है।
इनका उपयोग मुख्य रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा, परमाणु हथियार डिजाइन, क्रिप्टोग्राफी, मौसम विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमता एवं चिकित्सा के साथ-साथ अन्य कई क्षेत्रों में प्रचलित है।
1960 के दशक में सीमोर क्रे (Seymour Cray) द्वारा डिजाइन किया गया ‘सीडीसी 6600’ (CDC 6600) पहला सफल व्यावसायिक सुपरकंप्यूटर माना जाता है। वर्तमान में दुनिया का सबसे तेज सुपरकंप्यूटर जापान का ‘फुगाकू’ है।
