हाल ही में, हिमाचल प्रदेश में महिला किसानों द्वारा व्यापक रूप से प्राकृतिक खेती को एक स्थायी आजीविका के रूप में अपनाया जा रहा है। राज्य में अब तक 1.5 लाख से अधिक किसानों को प्राकृतिक खेती में प्रशिक्षित किया जा चुका है, जिसमें पर्याप्त संख्या महिला प्रतिभागियों की हैं।
प्राकृतिक खेती एक ऐसी प्रणाली है जहाँ प्रकृति के नियम कृषि पद्धतियों पर लागू होते हैं। यह एक रासायनिक मुक्त एवं अत्यंत कम लागत वाली पारंपरिक कृषि पद्धति है, जो कार्यात्मक जैव विविधता (Functional Biodiversity) के साथ फसलों, पेड़ों और पशुधन को एकीकृत करती है।
प्राकृतिक खेती के तहत मिट्टी में न तो रासायनिक और न ही जैविक खाद मिलाया जाता है। इस प्रणाली में, मिट्टी में कोई बाहरी उर्वरक नहीं डाला जाता है।
प्राकृतिक खेती को सबसे पहले जापान के मसानोबु फुकुओका (Masanobu Fukuoka) द्वारा इनकी पुस्तक द वन-स्ट्रॉ रेवोल्यूशन (1975) में बताया गया था।
शून्य बजट प्राकृतिक खेती (ZBNF) भारत में प्राकृतिक खेती का सबसे लोकप्रिय मॉडल है। इस प्राकृतिक एवं आध्यात्मिक कृषि प्रणाली का विकास पद्म श्री सुभाष पालेकर द्वारा कर्नाटक राज्य में किया गया।
विदित है कि भारत में, प्राकृतिक खेती को परंपरागत कृषि विकास योजना के तहत भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति कार्यक्रम (बीपीकेपी) के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है। बीपीकेपी कार्यक्रम आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश और केरल राज्य में अपनाया गया है।