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भारत में परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के लिए नया विधायी ढांचा

भारत में परमाणु ऊर्जा

सरकार ने सोमवार को लोकसभा में “सतत परमाणु ऊर्जा दोहन और विकास, भारत के परिवर्तन के लिए (शांति) विधेयक, 2025” (the Sustainable Harnessing and Advancement of Nuclear Energy for Transforming India (SHANTI) Bill, 2025) पेश किया। इस विधेयक का उद्देश्य भारत के अब तक अत्यधिक प्रतिबंधित रहे परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी को अनुमति देना है। यह विधेयक मौजूदा परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 तथा परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व अधिनियम, 2010 का स्थान लेगा।

भारत में पहले परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1948 लागू था, जिसे निरस्त कर परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 लाया गया। इस अधिनियम में अब तक चार बार संशोधन हो चुके हैं, जिनमें अंतिम संशोधन 2015 में हुआ था। वर्ष 2010 में परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व अधिनियम लागू किया गया, जिसने बिना दोष सिद्ध किए पीड़ितों को शीघ्र मुआवजा प्रदान करने की व्यवस्था की। नया विधेयक इस पूरे ढांचे को व्यापक रूप से पुनर्गठित करने का प्रयास करता है।

सरकार के अनुसार, यह विधेयक 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करने के लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसका उद्देश्य सार्वजनिक और निजी, दोनों क्षेत्रों की सक्रिय भागीदारी के माध्यम से भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता और स्वदेशी संसाधनों का पूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना है। सरकार का मानना है कि परमाणु ऊर्जा, देश की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।

विधेयक में कहा गया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंग, क्वांटम प्रौद्योगिकियाँ, स्वदेशी सेमीकंडक्टर निर्माण और डेटा-आधारित अनुसंधान जैसे क्षेत्रों के तीव्र विकास के लिए स्थिर, विश्वसनीय, स्वच्छ और चौबीसों घंटे बिजली आपूर्ति आवश्यक है। परमाणु ऊर्जा की विस्तारित तैनाती ही इस आवश्यकता को पूरा कर सकती है, जिसके लिए निजी क्षेत्र में अनुसंधान और नवाचार को प्रोत्साहित करने वाला नया कानूनी ढांचा जरूरी है।

नए विधेयक का एक महत्वपूर्ण प्रावधान ‘प्रतिपूर्ति के अधिकार’ से संबंधित है। इसमें उस पुराने प्रावधान को हटा दिया गया है, जिसके तहत परमाणु संयंत्र संचालक दुर्घटना की स्थिति में दोषपूर्ण उपकरणों, खराब सेवाओं या आपूर्तिकर्ताओं की लापरवाही के लिए उनसे मुआवजा मांग सकते थे। विदेशी परमाणु उपकरण विक्रेताओं ने लंबे समय से इस प्रावधान को भारत में निवेश के लिए एक बड़ी बाधा बताया था, क्योंकि इससे उन्हें दीर्घकालिक और अनिश्चित देयता जोखिम का सामना करना पड़ता था।

विधेयक के तहत अब सार्वजनिक और निजी कंपनियों, तथा उनके संयुक्त उपक्रमों को परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने, परमाणु ईंधन के परिवहन और भंडारण, तथा परमाणु ऊर्जा उत्पादन से संबंधित ईंधन, प्रौद्योगिकी, उपकरण और खनिजों के आयात–निर्यात की अनुमति दी जाएगी। हालांकि, इन सभी गतिविधियों के लिए परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड से सुरक्षा प्राधिकरण प्राप्त करना अनिवार्य होगा।

विधेयक में रेडियोधर्मी पदार्थों और विकिरण उत्पन्न करने वाले उपकरणों के निर्माण, उपयोग, परिवहन, आयात–निर्यात और निपटान के लिए सुरक्षा प्राधिकरण को अनिवार्य किया गया है। साथ ही, कुछ संवेदनशील गतिविधियों पर केंद्र सरकार का विशेष नियंत्रण बरकरार रखा गया है। इनमें रेडियोधर्मी पदार्थों का संवर्धन, समस्थानिक पृथक्करण, प्रयुक्त ईंधन और उच्च-स्तरीय रेडियोधर्मी अपशिष्ट का प्रबंधन, पुनर्संसाधन तथा भारी जल का उत्पादन और उन्नयन शामिल हैं।

विधेयक में परमाणु ऊर्जा निवारण सलाहकार परिषद, दावा आयुक्तों की नियुक्ति और गंभीर परमाणु क्षति मामलों के लिए परमाणु क्षति दावा आयोग की स्थापना का प्रावधान है। ऐसे मामलों में विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण को अपीलीय प्राधिकरण के रूप में नामित किया गया है। इसके अतिरिक्त, केंद्र सरकार को परमाणु दुर्घटना की स्थिति में अपनी देनदारी पूरी करने के लिए परमाणु देयता कोष स्थापित करने का अधिकार दिया गया है।

विधेयक में परमाणु ऊर्जा संचालकों के लिए संयंत्र की क्षमता के आधार पर चरणबद्ध देयता सीमा तय की गई है।

150 मेगावाट तक की क्षमता वाले छोटे रिएक्टरों, ईंधन चक्र सुविधाओं और परमाणु सामग्री परिवहन के लिए: 100 करोड़ रुपये

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