संदर्भ
हाल ही में, संसद ने देश में महत्वपूर्ण और गहराई में प्राप्त होने वाले खनिजों की खोज में निजी क्षेत्र के निवेश को आकर्षित करने के लिए खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2023 पारित किया।
हालिया संशोधन
यह संशोधन खनन क्षेत्र में प्रमुख सुधार प्रस्तुत करता है, जिसमें शामिल हैं:
- अधिनियम की पहली अनुसूची के भाग-बी में निर्दिष्ट 12 परमाणु खनिजों की सूची में से 6 खनिजों को हटा दिया गया है, अर्थात्, लिथियम, बेरिलियम, नाइओबियम, टाइटेनियम, टैंटलम और ज़िरकोनियम खनिजों की खोज और खनन का कार्य अब निजी संस्थाओं द्वारा भी किया जा सकता है।
- अधिनियम में अधिकांश नीलामियां राज्य सरकारों के लिए आरक्षित हैं, जबकि यह विधेयक महत्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों के लिए समग्र लाइसेंस और खनन पट्टे की नीलामी हेतु केंद्र सरकार को सशक्त बनाता है। इन खनिजों में मोलिब्डेनम, रेनियम, टंगस्टन, कैडमियम, इंडियम, गैलियम, ग्रेफाइट, वैनेडियम, टेल्यूरियम, सेलेनियम, निकल, कोबाल्ट, टिन, प्लैटिनम समूह के तत्व, “दुर्लभ जमीनी” समूह के खनिज (यूरेनियम और थोरियम शामिल नहीं); उर्वरक खनिज जैसे पोटाश, ग्लौकोनाइट और फॉस्फेट (यूरेनियम के बिना) शामिल है।
- यह विधेयक महत्वपूर्ण और गहराई में प्राप्त होने वाले खनिजों के लिए अन्वेषण लाइसेंस (exploration licence) की शुरूआत करता है। यह अन्वेषण लाइसेंस पांच वर्ष की अवधि (दो वर्ष तक विस्तार योग्य) के लिए, प्रतिस्पर्धी बोली के माध्यम से राज्य सरकार द्वारा प्रदान किया जाएगा।
- यह विधेयक अन्वेषण के लिए अधिकतम क्षेत्र भी निर्दिष्ट करता है; एकल अन्वेषण लाइसेंस के तहत 1,000 वर्ग किलोमीटर तक की गतिविधियों की अनुमति दी जाएगी।
- अधिनियम टोही के हिस्से के रूप में गड्ढा खोदने, खाई खोदने, ड्रिलिंग और उप-सतह उत्खनन पर रोक लगाता है, जिसमें मानचित्रण और सर्वेक्षण भी शामिल हैं। विधेयक इन प्रतिबंधित गतिविधियों की अनुमति देता है।
| खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 |
| खनिज क्षेत्र में कई सुधार लाने के लिए इस अधिनियम में वर्ष 2015 में व्यापक रूप से संशोधन किया गया था। इस संशोधन में खनन से प्रभावित लोगों और क्षेत्रों के कल्याण के लिए जिला खनिज फाउंडेशन (DMF) की स्थापना, अवैध खनन के लिए कड़े दंड को सुनिश्चित करने और खनिज संसाधनों के आवंटन में पारदर्शिता लाने के लिए राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण ट्रस्ट (NMET) की स्थापना हेतु नीलामी की प्रक्रिया को अनिवार्य किया गया था। इस अधिनियम को वर्ष 2016 और 2020 में संशोधित किया गया था और अंतिम बार वर्ष 2021 में भी इसमें संशोधन हुआ था। |
महत्वपूर्ण और गहराई में प्राप्त होने वाले खनिजों (दुर्लभ पृथ्वी तत्वों) का महत्व
ये खनिज किसी देश के विनिर्माण, बुनियादी ढांचे और विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसका उपयोग इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी और अन्य ऊर्जा भंडारण समाधानों में किया जाता है।
भारत सहित विभिन्न देशों द्वारा शुद्ध-शून्य उत्सर्जन लक्ष्यों की प्राप्ति लिथियम जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की उपलब्धता पर निर्भर हैं, जिसे ‘सफेद सोना’ भी कहा जाता है।
ये स्मार्ट इलेक्ट्रॉनिक्स में उपयोग किए जाने वाले सेमीकंडक्टर के निर्माण के लिए भी महत्वपूर्ण हैं; साथ ही, रक्षा और एयरोस्पेस उपकरण; दूरसंचार प्रौद्योगिकियाँ इत्यादि में भी इनका उपयोग होता है।
इनका उपयोग अंतरिक्ष उद्योग, ऊर्जा क्षेत्र में भी किया जाता है। ये खनिज पवन टरबाइन, सौर पैनल आदि बनाने में भी महत्वपूर्ण हैं।
विश्व बैंक के एक अध्ययन से पता चलता है कि लिथियम और कोबाल्ट जैसी महत्वपूर्ण धातुओं की मांग 2050 तक लगभग 500% बढ़ने की उम्मीद है।
दुर्लभ पृथ्वी तत्वों का उत्पादन
चीन के पास दुनिया के किसी भी देश की तुलना में दुर्लभ पृथ्वी तत्वों (आरईई) के भंडार की अब तक की सबसे बड़ी मात्रा है, इसके बाद वियतनाम, ब्राजील और रूस हैं; ये देश दुनिया के 65% आरईई का उत्पादन करते हैं।
कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में कोबाल्ट खदानों का अधिकांश स्वामित्व चीन के पास है, जहाँ दुनिया का 70% कोबाल्ट खनन किया जाता है।
इस बीच, भारत के पास दुनिया के दुर्लभ पृथ्वी भंडार का 6% है, लेकिन यह वैश्विक उत्पादन का केवल 1% ही खनन करता है।
ऐसे खनिजों की उपलब्धता की कमी या कुछ भौगोलिक स्थानों में उनके निष्कर्षण या प्रसंस्करण की एकाग्रता के कारण आयात निर्भरता, आपूर्ति श्रृंखला कमजोरियां कुछ प्रमुख चुनौतियां है।
भारत की स्थिति
खान मंत्रालय ने इस वर्ष जून में देश के आर्थिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण 30 खनिजों की एक सूची जारी की। हालाँकि, भारत इस सूची के अधिकांश खनिजों के लिए आयात पर अत्यधिक निर्भर है।
मंत्रालय द्वारा उद्धृत आंकड़ों के अनुसार, भारत लिथियम, कोबाल्ट, निकल, नाइओबियम, बेरिलियम और टैंटलम जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति के लिए चीन, रूस, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका जैसे देशों पर 100% आयात पर निर्भर है। उदाहरण के लिए, लिथियम के मामले में, 2021-2022 में भारत का आयात 22.15 मिलियन डॉलर का था।
इसके अलावा सोना, चांदी, तांबा, जस्ता, सीसा, निकल, कोबाल्ट, प्लैटिनम समूह तत्व (पीजीई) और हीरे जैसे गहराई में प्राप्त होने वाले खनिजों के लिए, जिनका पता लगाना और खनन करना सतही और बल्क खनिजों की तुलना में कठिन और महंगा होता है, भारत काफी हद तक आयात पर निर्भर है। उदाहरण के लिए, 2022-23 में, भारत ने लगभग 12 लाख टन तांबे का आयात किया।
हाल के दिनों में संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम और यूरोपीय संघ सहित प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं ऐसे खनिजों के लिए आपूर्ति-श्रृंखला लचीलेपन (supply-chain resilience) को सुरक्षित करने और चीन जैसे देशों पर अपनी निर्भरता को कम करने के लिए आगे बढ़ी हैं।
इसके लिए विभिन्न देशों द्वारा खनिज सुरक्षा साझेदारी (Mineral Security Partnership : MSP) पर हस्ताक्षर किया गया है, जिसका भारत भी इस वर्ष पक्षकार बन गया है।
| खनिज अन्वेषण |
| खनिज संसाधनों की खोज करने और अंततः आर्थिक रूप से व्यवहार्य भंडार खोजने के लिए प्राथमिक कदम खनिज अन्वेषण है, अन्वेषण के चरणों को टोही (खनिज संसाधनों को निर्धारित करने के लिए प्रारंभिक सर्वेक्षण), पूर्वेक्षण (खनिज भंडार की खोज, पता लगाना या साबित करना), सामान्य अन्वेषण और विस्तृत अन्वेषण (खनिज अयस्क और ग्रेड का अनुमान लगाना) में विभाजित किया जाता है। |
निजी क्षेत्र की भागीदारी की आवश्यकता
अन्वेषण और अनुसंधान के लिए परमाणु खनिज निदेशालय और सामाजिक और आर्थिक प्रगति केंद्र (सीईएसपी) जैसे संगठनों द्वारा किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि भारत की अद्वितीय भूवैज्ञानिक और टेक्टॉनिक सेटिंग संभावित खनिज संसाधनों की मेजबानी के लिए अनुकूल है और इसका भूवैज्ञानिक इतिहास खनन-समृद्ध पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया और पूर्वी अफ्रीका के क्षेत्र के समान है।
भारत ने अपनी स्पष्ट भूवैज्ञानिक क्षमता का केवल 10% ही खोजा है, जिसमें से 2% से भी कम का खनन किया जाता है और देश वैश्विक खनिज अन्वेषण बजट का 1% से भी कम खर्च करता है।
पिछले कुछ दशकों में देश में कोई महत्वपूर्ण खनिज खोजें नहीं हुई हैं और अधिकांश अन्वेषण परियोजनाएं सरकारी एजेंसियों भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण और खनिज अन्वेषण निगम लिमिटेड (MECL) जैसे सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा की गई हैं, जिनमें बहुत कम निजी क्षेत्र की भागीदारी है।
अन्वेषण के लिए हवाई सर्वेक्षण, भूवैज्ञानिक मानचित्रण और भू-रासायनिक विश्लेषण जैसी तकनीकों की आवश्यकता होती है और यह एक अत्यधिक विशिष्ट, समय-गहन और आर्थिक रूप से जोखिम भरा कार्य है।
भारतीय सार्वजनिक उपक्रम कोयला और लौह अयस्क जैसे सतही और बल्क खनिजों का पता लगाने के लिए अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में थे, लेकिन जब गहरे और महत्वपूर्ण खनिजों की बात आई तो उन्होंने उच्च व्यय और जोखिम भरी परियोजनाओं की लंबी अवधि के कारण के कारण अच्छा प्रदर्शन नहीं किया।
खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2023 निजी क्षेत्र की क्षमता को अन्वेषण में शामिल करके भारत में अन्वेषण प्रक्रियाओं को विकसित देशों के बराबर लाने का प्रयास करता है।
ऑस्ट्रेलिया और वैश्विक स्तर पर कई अन्य देशों में, निजी खनन कंपनियाँ जिन्हें जूनियर खोजकर्ता कहा जाता है, संभावित खदानों को खोजने के लिए अपनी विशेषज्ञता और सीमित वित्तीय संसाधनों को अन्वेषण में लगाकर जोखिम लेने में संलग्न हैं।
एक बार खोजे जाने के बाद, ये निजी कंपनियाँ इन्हें बड़ी खनन कंपनियों को बेच सकती हैं जो फिर इन खदानों को विकसित करती हैं और चलाती हैं।
इससे अन्वेषण परियोजनाओं को बढ़ाने और निजी भागीदारी के कारण अन्वेषण की गति में तेजी लाने में मदद मिलती है।
निष्कर्ष
प्रस्तावित अन्वेषण लाइसेंस महत्वपूर्ण और गहराई में प्राप्त होने वाले खनिज के अन्वेषण के सभी क्षेत्रों में निजी क्षेत्र की भागीदारी को सुविधाजनक बनाएगा। अन्वेषण में निजी एजेंसियों को शामिल करने से महत्वपूर्ण और गहराई में प्राप्त होने वाले खनिजों की खोज में उन्नत प्रौद्योगिकी, वित्त और विशेषज्ञता को बढ़ावा मिलेगा।
प्रश्न: भारत में दुर्लभ पृथ्वी तत्वों के खनन की आवश्यकता का उल्लेख कीजिये। खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक 2023 किस प्रकार निजी क्षेत्र को खनिज अन्वेषण में लाने की योजना बनाता है?

