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शंघाई सहयोग संगठन एवं भारत

Shanghai Cooperation Organization and India

संदर्भ

हाल ही में, शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन 2022 के शिखर सम्मेलन का आयोजन उज्बेकिस्तान के समरकंद में किया गया है। इस संगठन के अगले शिखर सम्मलेन की अध्यक्षता भारत द्वारा की जाएगी।

शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन क्या है

शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (SCO) 2001 में स्थापित एक स्थायी अंतर सरकारी संगठन है, जिसके संस्थापक सदस्यों में कज़ाकिस्तान, चीन, किर्गिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान सम्मिलित हैं।

2017 में भारत और पाकिस्तान को पूर्ण सदस्य का दर्जा प्रदान करने के बाद वर्तमान में इस संगठन के सदस्यों की संख्या 8 हो गयी है।

2021 में एक पूर्ण सदस्य के रूप में ईरान को शामिल करने की प्रक्रिया शुरू करने का निर्णय लिया गया।

एससीओ की परिषद्

एससीओ की दो परिषदें हैं- राष्ट्र प्रमुखों की परिषद् (Heads of State Council) एवं शासन प्रमुखों की परिषद् (Heads of Government Council)।

राष्ट्र प्रमुखों की परिषद् (Heads of State Council) एससीओ में सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था है, जो एससीओ के सभी महत्त्वपूर्ण मामलों पर निर्णय और दिशानिर्देश देती है।

शासन प्रमुखों की परिषद् (Heads of Government Council) में संगठन के देश बहुपक्षीय सहयोग रणनीति और प्राथमिकता क्षेत्रों पर चर्चा करने, वर्तमान महत्त्वपूर्ण आर्थिक और अन्य सहयोग के मुद्दों को हल करने तथा  संगठन के वार्षिक बजट को मंजूरी देने के लिए एकत्रित होते हैं।

विदित है कि एससीओ की इन दोनों परिषदों की वर्ष में एक बार बैठक आयोजित होती है।

एससीओ के मुख्य लक्ष्य

सदस्य राष्ट्रों के मध्य आपसी विशवास को मजबूत करना।

राजनीति, व्यापार, अर्थव्यवस्था,अनुसंधान, प्रौद्योगिकी, शिक्षा, ऊर्जा, परिवहन, पर्यटन, पर्यावरण संरक्षण आदि क्षेत्रों में प्रभावी सहयोग को बढ़ावा देना।

क्षेत्र में शांति, सुरक्षा एवं स्थिरता को बनाए रखने और सुनिश्चित करने के लिए साझा प्रयास करना।

लोकतांत्रिक, निष्पक्ष और तर्कसंगत नए अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक एवं आर्थिक व्यवस्था की स्थापना करना।

एससीओ में भारत

2017 में एससीओ का पूर्णकालिक सदस्य बनने से पूर्व भारत इस संगठन से पर्यवेक्षक देश के तौर पर 2005 से ही जुड़ा हुआ था।

‘पूर्व के गठबंधन’ के रूप में चर्चित इस संगठन में भारत का शामिल होना एक कूटनीतिक चुनौती के रूप में देखा जाता है क्योंकि हालिया वर्षों में इंडो-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका से भारत के घनिष्ठ संबंध स्थापित हुए हैं।

भारत के लिए एससीओ की महत्ता

इस संगठन को सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन माना जाता है जिसमें भागीदार देशों में चीन, रूस के बाद भारत तीसरा सबसे बड़ा राष्ट्र है। इस तरह इस संगठन में भारत के सम्मिलित होने से भारत का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महत्त्व बढ़ा है।

 मध्य एशिया के देशों से भारत के घनिष्ठ सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंधों को वर्तमान में भी बनाए रखने में यह संगठन अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। इस संगठन का पूर्ण सदस्य बनने से इस क्षेत्र में भारत की स्थिति मजबूत होगी।

यह संगठन विश्व की आबादी के लगभग 42% का प्रतिनिधित्व करता हैं, जो कि वैश्विक जीडीपी में लगभग 20% का योगदान करते हैं।

 अपने विशाल बाजार के कारण यह संगठन मध्य एशिया के देशों के साथ भारत के आर्थिक संबंधों को विस्तारित करने में प्रभावी भूमिका निभा सकता है, जिससे दूरसंचार, सूचना प्रौद्योगिकी, बैंकिंग तथा फार्मा उद्योगों हेतु एक विशाल बाज़ार भारत के लिए उपलब्ध हो सकेगा।

भारत इस क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और समृद्धि की स्थापना हेतु आतंकवाद, अलगाववाद, अवैध हथियारों एवं ड्रग्स की तस्करी और मनी लॉन्डरिंग के विरुद्ध एससीओ के साथ मिलकर कार्य कर रहा है।

विदित है कि एससीओ की क्षेत्रीय आतंकवाद रोधी संरचना (RATS) के माध्यम से भारत की खुफिया और गुप्त सूचनाओं तक पहुंच हो सकेगी।

‘कनेक्ट सेंट्रल एशिया’ और एससीओ

मध्य एशियाई देशों तक बेहतर कनेक्टिविटी प्राप्त करने के लिए भारत, अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा, चाबहार पोर्ट, अश्गाबात समझौते जैसी कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर जोर दे रहा है।

वहीं दूसरी तरफ चीन लगातार इस क्षेत्र में बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) जैसे प्रयासों से अपनी उपस्थिति बढ़ा रहा है।

इस तरह यह संगठन भारत की कनेक्टिविटी परियोजनाओं को गति प्रदान करेगा, जिससे मध्य एशिया के क्षेत्र में प्रभावी हो रहे चीन से भी निपटने में मदद मिलेगी।

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