संदर्भ
भारत सरकार ने सिकल सेल एनीमिया के उपचार हेतु क्रिस्पर (Clustered Regularly Interspaced Short Palindromic Repeats : CRISPR) विकसित करने के लिए पाँच वर्ष की परियोजना को मंजूरी दी है।
क्रिस्पर तकनीक क्या है
क्लस्टर्ड रेगुलर इंटरस्पेस्ड शॉर्ट पैलिंड्रोमिक रिपीट को संक्षिप्त रूप में क्रिस्पर कहा जाता है। यह बैक्टीरिया में पाए जाने वाले डीएनए के क्लस्टर और दोहराव वाले अनुक्रमों का एक सेट है, जो बैक्टीरिया में कुछ वायरल रोगों से लड़ने के लिए प्राकृतिक रूप से कार्य करता है, जिसका उपयोग इसमें किया जाता है। इस प्रकार, यह प्रौद्योगिकी बैक्टीरिया के प्राकृतिक रक्षा तंत्र की नकल करती है।
किसी जीव में विशिष्ट गुणों को खत्म करने या डालने के लिए जीन अनुक्रमों का संपादन या संशोधन कई दशकों से हो रहा है, विशेष रूप से कृषि के क्षेत्र में, जहां विशिष्ट वांछनीय लक्षणों के साथ आनुवंशिक रूप से संशोधित पौधे विकसित किये जाते हैं।
क्रिस्पर तकनीक कैसे काम करती है
क्रिस्पर तकनीक सरल और अधिक सटीक है, इसमें बाहर से किसी भी नए जीन का प्रवेश शामिल नहीं है। इसकी तुलना अक्सर सामान्य कंप्यूटर प्रोग्रामों में ‘कट-कॉपी-पेस्ट’, या ‘ढूंढें-बदलें’ विधि से की जाती है।
डीएनए अनुक्रम में खराबी, जो किसी बीमारी या विकार का कारण है, को काटकर हटा दिया जाता है और फिर एक ‘सही’ अनुक्रम के साथ बदल दिया जाता है। इसके लिए उपयोग किए जाने वाले उपकरण यांत्रिक नहीं हैं, बल्कि जैव रासायनिक – विशिष्ट प्रोटीन और आरएनए अणु होते हैं।
इस तकनीक में जीन के उस विशेष क्रम की पहचान की जाती है जो बीमारी का कारण है। एक बार ऐसा करने के बाद, डीएनए स्ट्रैंड पर इस क्रम का पता लगाने के लिए एक आरएनए अणु को प्रोग्राम किया जाता है, जैसे कंप्यूटर पर ‘ढूंढें’ या ‘खोज’ फ़ंक्शन। इसके बाद, कैस9 (Cas9) नामक एक विशेष प्रोटीन, जिसे अक्सर ‘जेनेटिक कैंची’ के रूप में वर्णित किया जाता है, का उपयोग विशिष्ट बिंदुओं पर डीएनए स्ट्रैंड को तोड़ने और खराब अनुक्रम को हटाने के लिए किया जाता है।
एक डीएनए स्ट्रैंड में टूटने के बाद फिर से जुड़ने और खुद को ठीक करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। लेकिन अगर ऑटो-मरम्मत तंत्र को जारी रखने की अनुमति दी जाती है, तो खराब क्रम फिर से बढ़ सकता है। इसलिए, वैज्ञानिक आनुवंशिक कोड के सही अनुक्रम की आपूर्ति करके ऑटो-मरम्मत प्रक्रिया के दौरान हस्तक्षेप करते हैं, जो टूटे हुए डीएनए स्ट्रैंड से जुड़ जाता है। यह एक लंबे ज़िपर के क्षतिग्रस्त हिस्से को काटने और इसे सामान्य रूप से काम करने वाले हिस्से से बदलने जैसा है।
क्रिस्पर तकनीक के लाभ
यह प्रौद्योगिकी जीवित जीवों के आनुवंशिक कोड को एडिट/संपादित/फेर-बदल करने के लिए एक सरल तरीका उपलब्ध कराती है। यह जटिल बीमारियों को ठीक करने, शारीरिक विकृतियों को रोकने एवं कॉस्मेटिक संवर्द्धन के लिए आनुवंशिक सुधार के द्वार खोलती है।
बड़ी संख्या में रोग और विकार प्रकृति में अनुवांशिक होते हैं अर्थात, वे जीन में अवांछित परिवर्तन या उत्परिवर्तन के कारण होते हैं। इनमें सिकल सेल एनीमिया जैसे सामान्य रक्त विकार, वर्णान्धता, कई प्रकार के कैंसर, मधुमेह, एचआईवी और हृदय रोग शामिल हैं। इनमें से कई वंशानुगत भी हैं। यह तकनीक इनमें से कई बीमारियों के स्थायी इलाज की क्षमता रखती है।
भारत में क्रिस्पर तकनीक
भारत में, सीएसआईआर के इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी संस्थान ने सिकल सेल एनीमिया के लिए स्वदेशी रूप से एक क्रिस्पर आधारित चिकित्सीय समाधान विकसित किया है, जिसे नैदानिक परीक्षणों के लिए तैयार किया जा रहा है।
यह अभी प्री-क्लिनिकल चरण (पशु परीक्षण) में हैं, जिसे क्लिनिकल ट्रायल स्टेज तक पहुंचने में लगभग दो से तीन वर्ष लगेंगे। यह पहली बीमारी है जिसके उपचार के लिए भारत में क्रिस्पर आधारित चिकित्सा तकनीक को विकसित किया जा रहा है।
थैलेसीमिया या सिकल सेल एनीमिया जैसी बीमारियों के लिए क्रिस्पर का उपयोग संयुक्त राज्य अमेरिका में नैदानिक परीक्षणों (Clinical trial) के चरण में हैं, जहाँ इसके प्रारंभिक परिणाम दोषरहित रहे हैं।
क्रिस्पर तकनीक की नैतिक दुविधा
वैज्ञानिक, किसी व्यक्ति में नाटकीय परिवर्तन लाने के लिए क्रिस्पर की क्षमता के कारण, इसके दुरुपयोग की आशंका व्यक्त कर रहे हैं।
2018 में, एक चीनी शोधकर्ता ने खुलासा किया कि उसने एचआईवी के संक्रमण को रोकने के लिए एक मानव भ्रूण के जीन को बदल दिया था। यह ‘डिजाइनर बेबी’ बनाने का पहला प्रलेखित मामला था, और इसने वैज्ञानिक समुदाय में व्यापक चिंता पैदा की।
हालांकि तकनीक काफी सटीक है लेकिन 100 प्रतिशत नहीं, जो कुछ त्रुटियों और विकारों को भी प्रेरित कर सकती है, जिससे अन्य जीनों में परिवर्तन हो सकता है। इसके उत्तरोत्तर पीढ़ियों में प्रसारित होने की संभावना है।

